21वीं सदी की वैश्विक राजनीति में एक नया और निर्णायक मोड़ देखने को मिल रहा है, जहाँ विकासशील और उभरते हुए देश अब अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर केवल दर्शक नहीं, बल्कि नीति-निर्धारक की भूमिका में आ चुके हैं। दशकों तक पश्चिमी देशों का वर्चस्व वैश्विक अर्थव्यवस्था, संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों पर हावी रहा। लेकिन हाल के वर्षों में भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और इंडोनेशिया जैसे देशों ने एकजुट होकर यह साबित कर दिया है कि दुनिया का भविष्य केवल विकसित पश्चिमी देशों के एजेंडे से तय नहीं होगा।
विकासशील राष्ट्रों के इस उभार का सबसे बड़ा कारण वैश्विक बहुध्रुवीयता का बढ़ना है। रूस-यूक्रेन संघर्ष हो या मध्य पूर्व का तनाव, विकासशील देशों ने किसी एक महाशक्ति का पिछलग्गू बनने के बजाय अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता दी है। भारत जैसे देशों ने बीस देशों के समूह (जी-20) की अध्यक्षता के दौरान अफ़्रीकी संघ को स्थायी सदस्यता दिलाकर यह स्पष्ट संदेश दिया कि जब तक दुनिया की बड़ी आबादी को अंतर्राष्ट्रीय फैसलों में प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा, तब तक कोई भी वैश्विक समाधान समावेशी नहीं हो सकता।
आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और ऊर्जा सुरक्षा में उभरती अर्थव्यवस्थाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। पश्चिमी देश अब केवल विनिर्माण के लिए ही इन देशों पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि हरित ऊर्जा के संक्रमण के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण खनिजों और मानव संसाधन के लिए भी इन्हीं देशों की ओर देख रहे हैं। ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) संगठन का विस्तार और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार करने की बढ़ती प्रवृत्ति यह दर्शाती है कि विदेशी मुद्राओं के वर्चस्व को चुनौती देने वाला एक नया आर्थिक ढांचा तैयार हो रहा है।
हालांकि, इन देशों के सामने भी कई आंतरिक चुनौतियाँ हैं। यहाँ भारी आर्थिक विषमता, जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा प्रभाव और खाद्य सुरक्षा जैसे बुनियादी मुद्दे मौजूद हैं। इसके अलावा, सभी उभरते देशों के हित एक समान नहीं हैं; चीन और भारत के बीच का रणनीतिक तनाव इसका एक प्रमुख उदाहरण है। चीन जहाँ वित्तीय कर्जों के माध्यम से इन देशों पर अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहता है, वहीं भारत लोकतंत्र, पारदर्शिता और सतत विकास के मॉडल को बढ़ावा देता है।
अंततः, विकासशील देशों की यह गोलबंदी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को अधिक न्यायसंगत और संतुलित बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे द्वितीय विश्व युद्ध के दौर के संस्थानों में सुधार की माँग अब इतनी तेज हो चुकी है कि इसे ज्यादा देर तक नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दुनिया को अब यह स्वीकार करना होगा कि शांति, स्थिरता और समृद्धि का रास्ता केवल वाशिंगटन या ब्रसेल्स से होकर नहीं गुजरता, बल्कि इसमें नई दिल्ली, ब्रासीलिया और प्रिटोरिया की आवाज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।