क्या कहती हैं बहादुर बच्चियां?

जलज वर्मा

 |  24 Jan 2017 |   52
Culttoday

भारत में लाखों महिलाएं और बच्चे यौन तस्करों का शिकार हो चुके हैं. अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के मुताबिक दुनिया में मानव तस्करी 150 अरब डॉलर का कारोबार है. हर देश इससे प्रभावित है, उत्पत्ति, ट्रांजिट या लक्ष्य के रूप में. भारत भी इसका मुख्य अड्डा है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में हर आठ मिनट में एक बच्चा गायब होता है. ऐसे में दो स्कूली छात्राओं का आगे आना और तस्करों को पकड़वाना सराहनीय कहा जा सकता है. इस बहादुरी के लिए तेजस्विता प्रधान और शिवानी गोंड को प्रतिष्ठित गीता चोपड़ा अवॉर्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है. अब उन्हें राष्ट्रीय बहादुरी पुरस्कार भी दिया जाएगा. डॉयचे वेले ने सैकड़ों लड़कियों को बचाने वाली इन दो छात्राओं से बात की. हम साभार इस साक्षात्कार को कल्ट करंट के पाठकों के लिए प्रकाशित कर रहे हैं.

इस जोखिम भरे मिशन में हिस्सा लेने का फैसला आपने कैसे किया?

तेजस्विता प्रधान: हम प्रेरित थे क्योंकि हमें यकीन था कि अगर इस जोखिम भरे मिशन में हम सफल हुए तो एक बार में हजारों लड़कियां बचाई जा सकेंगी. हम मानव तस्करी के बारे में जानते थे क्योंकि हम मार्ग एनजीओ के तहत चलने वाले स्टूडेंट्स अंगेस्ट ट्रैफिकिंग क्लब के वॉलंटियर हैं. क्लब और एनजीओ तस्करी और यौन दुर्व्यवहार को रोकते हैं. यह एक संयुक्त अभियान था, जिसमें पुलिस और मैनकाइंड इन एक्शन फॉर रुरल ग्रोथ (मार्ग) शामिल थे. इसी ने पश्चिम बंगाल में तस्करी के रैकेट का भंडाफोड़ किया.

आपने योजना कैसे बनाई?

शिवानी गोंड: हमने फेसबुक पर नकली अकाउंट बनाए और उनके जरिये ये दिखाने की कोशिश की कि हम काम करना चाहते हैं. यह बीते साल मई में किया गया. पुलिस और एनजीओ को इसके बारे में पहले से पता था. हमें तीन महीने लगे. इस दौरान एक शख्स ने हमसे संपर्क किया और बताया कि हमें काम के दौरान क्या करना होगा. हमारी एक महिला से भी दोस्ती हुई, वही आखिर में तस्कर गैंग की सप्लायर निकली. हमें बताया गया कि हमें होटलों में काम करना होगा, तभी हमें अंदाजा हुआ कि ये तस्करी गिरोह हो सकता है.

क्या आपको डर नहीं लगा?

तेजस्विता: जाहिर तौर पर, हमें डर तो लगा. लेकिन हमें पता था कि टीम हमारे साथ है और पुलिस की मदद भी मिलेगी. तब हमें लगा कि हम उन तक पहुंच सकते हैं, अगर हम ऐसा न हुआ तो हम मिशन को रोक देंगे और भाग जाएंगे. लेकिन दोनों ही मामलों में पुलिस हमारे साथ थी, वे गिरफ्तार हो ही जाते. शुरू में हमारे माता पिता को घबराहट थी लेकिन जब उन्हें पता चला कि हमें समर्थन है तो उन्होंने हमें इसमें हिस्सा लेने दिया.

मीटिंग कैसे तय की गई?

शिवानी गोंड: हम भारत-नेपाल सीमा के पास पानीटंकी पर मिले फिर हमने एक होटल में उन लोगों का इंतजार किया. लड़कों का ग्रुप आया, वे सभी काफी युवा थे. हमें यकीन ही नहीं हुआ कि ये तस्कर हैं. लेकिन हम शांत रहे. कुछ देर बाद हमने छुपे हुए पुलिस और एनजीओ कर्मियों को इशारा किया, वे वेटर के भेष में थे. सिग्नल सिर खुजलाने का था. गिरफ्तारी कुछ ही देर बाद हो गई.

पश्चिम बंगाल जैसी जगहों में बड़े पैमाने पर लड़कियों की तस्करी होती है. क्या आप इस समस्या की भयावहता के बारे में जानती हैं?

तेजस्विता: हां, हम इस समस्या और इसकी पहुंच के बारे में जानते हैं. जिस एनजीओ में हम वॉलंटियर हैं उसने हमें ये बताया. दार्जिलिंग में हर कोई इसके बारे में जानता है और हमें उम्मीद है कि हमारे कदम से एक सीधा और मजबूत संदेश गया है कि कैसे भोले भाले लोग मानव तस्करी का शिकार हो रहे हैं. यह दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन तस्कर गरीबों को निशाना बनाते हैं और उनके निशाने पर आने वाले लोगों के पास इन अपराधिक तत्वों का पता लगाने का कोई उपाय नहीं होता.

देश भर की युवतियों को आप क्या संदेश देना चाहेंगी?

शिवानी: हमारे पास अपनी उम्र की लड़कियों के लिए खास तौर पर एक संदेश है. मिलकर हम जागरूकता फैला सकते हैं. हम सोशल मीडिया के दौर में जी रहे हैं जहां जानकारी को विस्तार से फैलाया जा सकता है. संदेश साफ है: साथ मिलकर सही तरीके से जागरूकता फैलाकर हम इस समस्या से निपट सकते हैं.


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