वार्ता विफल, आंदोलन तेज: झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं की शुचिता और युवाओं का संघर्ष
श्रीराजेश
| 12 Aug 2026 |
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झारखंड में छात्र असंतोष की प्रचंड ज्वाला: परीक्षा में कथित धांधली पर उबला युवा आक्रोश झारखंड की राजधानी रांची समेत पूरा राज्य इस समय छात्रों और प्रतियोगी परीक्षार्थियों के अभूतपूर्व विरोध-प्रदर्शन की लपटों में घिरा हुआ है। झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) की विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, पेपर लीक और पारदर्शी चयन प्रक्रिया के अभाव को लेकर हजारों युवा सड़कों पर उतर आए हैं। मोराबादी मैदान से लेकर राजभवन के समक्ष छात्रों के जमावड़े, लगातार जारी पदयात्राओं और आमरण अनशन ने राज्य प्रशासन की नींद उड़ा दी है। यह आंदोलन अब केवल कुछ छात्रों का विरोध नहीं रहा, बल्कि पूरे प्रदेश के शिक्षित युवाओं की व्यवस्थागत हताशा और आक्रोश का प्रतीक बन चुका है। वार्ताओं का दौर विफल: ठोस आश्वासन के बिना पीछे हटने को तैयार नहीं युवा बढ़ते जन-दबाव के बीच राज्य सरकार और छात्र प्रतिनिधियों के बीच कई दौर की उच्चस्तरीय बैठकें हुई हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकल सका है। सरकारी आश्वासन केवल प्रशासनिक जांच और कमेटियों के गठन तक सीमित रहे हैं, जिन्हें आंदोलनकारी छात्रों ने सिरे से खारिज कर दिया है। छात्रों का स्पष्ट कहना है कि जब तक विवादित परीक्षाओं को पूरी तरह रद्द नहीं किया जाता, पारदर्शी डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली लागू नहीं होती और पूरी गड़बड़ी की केंद्रीय एजेंसियों से निष्पक्ष जांच नहीं कराई जाती, तब तक बातचीत का कोई सार्थक परिणाम नहीं आ सकता। इस गतिरोध ने प्रशासनिक व्यवस्था को पूरी तरह से बैकफुट पर धकेल दिया है। पारंपरिक व आधुनिक मंचों का अनूठा संगम: डिजिटल मोर्चे से भी घिरी सरकार यह छात्र आंदोलन न केवल सड़कों पर बल्कि डिजिटल दुनिया में भी नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। एक तरफ जहां रांची, धनबाद, जमशेदपुर और हजारीबाग जैसे प्रमुख शहरों में छात्र पदयात्राओं और भूख हड़ताल के जरिए अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर हैशटैग अभियानों के जरिए इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उजागर किया जा रहा है। देश भर के प्रमुख शिक्षाविदों, नागरिक समाज के संगठनों और विभिन्न राज्य स्तरीय छात्र समूहों का भी इस आंदोलन को समर्थन मिलने लगा है। इसने आंदोलन को एक मजबूत वैचारिक और सामाजिक आधार प्रदान कर दिया है, जिससे प्रशासनिक तंत्र पर दोहरा दबाव बन गया है। सालों की मेहनत, बार-बार उठते सवाल और युवाओं का टूटता धैर्य इस व्यापक आंदोलन की तह में जाने पर वह अंतहीन संघर्ष नजर आता है, जिससे एक प्रतियोगी छात्र सालों तक गुजरता है। दूर-दराज के गांवों से आकर किराए के कमरों में तंगहाली के बीच तैयारी करने वाले इन युवाओं का भविष्य बार-बार पेपर लीक और परिणाम में देरी की भेंट चढ़ जाता है। भर्ती एजेंसियों के पुनर्गठन और पारदर्शी नीतियों के बिना बार-बार परीक्षाएं आयोजित करना केवल संसाधनों और समय की बर्बादी साबित हो रहा है। यही वजह है कि युवाओं का सब्र अब पूरी तरह टूट चुका है और वे इस बार बिना किसी ठोस, स्थायी नीतिगत बदलाव के अपना आंदोलन समाप्त करने के मूड में बिल्कुल नजर नहीं आ रहे हैं। राजनीतिक तापमान चरम पर: पारदर्शी नीतियां और त्वरित समाधान ही एकमात्र रास्ता छात्र आंदोलन के इस नए और उग्र रूप ने राज्य में राजनीतिक सरगर्मियां भी तेज कर दी हैं। विपक्षी दल जहां इस मुद्दे को भुनाकर सरकार की घेराबंदी करने में लगे हैं, वहीं सत्तारूढ़ दल के लिए यह प्रशासनिक जवाबदेही और साख की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुका है। इतिहास गवाह है कि जब-जब युवा शक्ति का आक्रोश सड़कों पर उतरा है, तब-तब स्थापित प्रशासनिक ढांचों को झुकना पड़ा है। यदि सरकार ने समय रहते छात्रों की जायज मांगों को स्वीकार करते हुए भर्ती प्रणाली की शुचिता बहाल करने के लिए कड़े कदम नहीं उठाए, तो यह आंदोलन आने वाले दिनों में और अधिक व्यापक तथा उग्र रूप धारण कर सकता है।