भारतीय वैज्ञानिकों ने गेहूं के ऐसे नमूनों की पहचान की है जिनमें पत्तियों में होने वाले रतुआ रोग से लड़ने की आनुवांशिक क्षमता पाई जाती है. इन नमूनों में पाए जाने वाले कुछ जीन्स नई रतुआ प्रतिरोधी किस्मों के विकास में मददगार हो सकते हैं.
एक अध्ययन में गेहूं के जर्म प्लाज्म भंडार के 6,319 नमूनों में से 190 नमूने देश के 10 अलग-अलग गेहूं उत्पादक क्षेत्रों से चुने गए हैं. आनुवांशिक अध्ययनों के आधार इन नमूनों में एपीआर जीन्स की पहचान की गई है और फिर उनकी प्रतिरोधक क्षमता और स्थिरता का मूल्यांकन किया गया है.
2 से 3 संयुक्त एपीआर जीन्स वाले 49 नमूने शोधकर्ताओं को मिले. विभिन्न स्थानों पर मूल्यांकन करने पर इनमें से 8 नमूने रोग प्रतिरोधी टिकाऊ प्रजातियों के विकास के लिए अनुकूल पाए गए जबकि 52 नमूनों में एपीआर जीन्स नहीं पाए जाने के बावजूद उनमें उच्च प्रतिरोधी स्तर देखा गया है. इनमें से 73 प्रतिशत नमूनों में 1 या अधिक एपीआर जीन्स मौजूद थे.
गेहूं में रतुआ जैसे फफूंदजनित रोग से जुड़े सुरक्षा तंत्र के पीछे एक या अधिक एपीआर जीन्स की भूमिका हो सकती है. एपीआर जीन्स का प्रतिरोधी प्रभाव आमतौर पर वयस्क पौधों में देखने को मिलता है. रतुआ प्रतिरोधी जीन्स के लक्षण, पत्तियों में रतुआ रोग के प्रभाव और एपीआर की सर्वाधिक प्रतिक्रिया ठंडे स्थानों से प्राप्त नमूनों में अधिक देखी गई है. यह अध्ययन शोध पत्रिका 'प्लॉस वन' में प्रकाशित किया गया है.