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सिर्फ वैदिक रीति से ही क्यों करें विवाह संस्कार

हिन्दू शास्त्रों में प्रमुख 16 संस्कारों में विवाह भी है. यदि वह संन्यास नहीं लेता है तो प्रत्येक व्यक्ति को विवाह करना जरूरी है. विवाह करने के बाद ही पितृऋण चुकाया जा सकता है. वि + वाह = विवाह अर्थात अत: इसका शाब्दिक अर्थ है- विशेष रूप से (उत्तरदायित्व का) वहन करना. विवाह को पाणिग्रहण कहा जाता है.

कल्ट करंट डेस्क
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02 Jan 2020
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हिन्दू शास्त्रों में प्रमुख 16 संस्कारों में विवाह भी है. यदि वह संन्यास नहीं लेता है तो प्रत्येक व्यक्ति को विवाह करना जरूरी है. विवाह करने के बाद ही पितृऋण चुकाया जा सकता है. वि + वाह = विवाह अर्थात अत: इसका शाब्दिक अर्थ है- विशेष रूप से (उत्तरदायित्व का) वहन करना. विवाह को पाणिग्रहण कहा जाता है. दरअसल, विवाह संस्कार हिन्दू धर्म संस्कारों में 'त्रयोदश संस्कार' है.



विवाह करके एक पत्नी व्रत धारण करना ही सभ्य मानव की निशानी है. बहुत सोच-समझ कर वैदिक ऋषियों ने विवाह के कुछ प्रकार बताएं जिसमें से कुछ तरह के विवाह को समाज में निषेध किया गया. प्रजापत्य विवाह, गंधर्व विवाह, असुर विवाह, राक्षस विवाह, पैशाच विवाह आदि. आधुनिकता के नाम पर 'लिव इन रिलेशनशिप' जैसे निषेध विवाह को बढ़ावा देना देश और धर्म के विरुद्ध ही है. इस तरह के विवाह कुल के नाश और देश के पतन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आए हैं.



प्रत्येक प्रांत में हिन्दुओं ने अपने विवाह के रीति रिवाज को स्थानीयता के आधार पर गढ़ा है. प्राचीन काल में ऐसा नहीं था. सभी वेद सम्मत विवाह ही करते थे. लंबी काल परंपरा और विदेशी धर्म और संस्कृति के मिश्रण के कारण हिन्दू विवाह संस्कार में विकृति आ गई जिसके चलते प्रत्येक समाज, प्रांत और स्थान विशेष के विवाह संस्कार भी भिन्न हो गए जो कि अनुचित है.



हिन्दू धर्म का एकमात्र धर्मग्रंथ वेद हैं. वेद अनुसार किए गए विवाह संस्कार ही शास्त्रसम्मत होते हैं. वेदों के अलावा गृहसूत्रों में संस्कारों का उल्लेख मिलता है. विवाह को हिन्दुओं के प्रमुख 16 संस्कारों में से एक माना जाता है जो कि बहुत ही पवित्र कर्म होता है. इसी संस्कार के बाद व्यक्ति गृहस्थ जीवन में प्रवेश करता है. यदि यह संस्कार उचित रीति से नहीं हुआ है तो यह महज एक समझौता ही होगा.



आज विवाह वासना-प्रधान बनते चले जा रहे हैं. रंग, रूप एवं वेष-विन्यास के आकर्षण को पति-पत्नि के चुनाव में प्रधानता दी जाने लगी है, दूसरी ओर वर पक्ष की हैसियत, धन, सैलरी आदि देखी जाती है. यह प्रवृत्ति बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है. लोगों की इसी सोच के कारण दाम्पत्य-जीवन और परिवार बिखरने लगे हैं. प्रेम विवाह और लीव इन रिलेशन पनपने लगे हैं जिनका अंजाम भी बुरा ही सिद्ध होता है. विवाह संस्कार अब एक समझौता, बंधन और वैध व्याभिचार ही रह गया है जिसका परिणाम तलाक, हत्या या आत्महत्या के रूप में सामने देखने को मिलता है. अन्यथा वर के माता पिता को अपने ही घर से बेदखल किए जाने के किस्से भी आम हो चले हैं.



हिन्दू धर्मानुसार विवाह एक ऐसा कर्म या संस्कार है जिसे बहुत ही सोच-समझ और समझदारी से किए जाने की आवश्यकता है. दूर-दूर तक रिश्तों की छानबिन किए जाने की जरूरत है. जब दोनों ही पक्ष सभी तरह से संतुष्ट हो जाते हैं तभी इस विवाह को किए जाने के लिए शुभ मुहूर्त निकाला जाता है. इसके बाद वैदिक पंडितों के माध्यम से विशेष व्यवस्था, देवी पूजा, वर वरण तिलक, हरिद्रालेप, द्वार पूजा, मंगलाष्टकं, हस्तपीतकरण, मर्यादाकरण, पाणिग्रहण, ग्रंथिबन्धन, प्रतिज्ञाएं, प्रायश्चित, शिलारोहण, सप्तपदी, शपथ आश्‍वासन आदि रीतियों को पूर्ण किया जाता है.