दिल्ली में पूर्वांचलियों को सभी पार्टियां पटाने में लग गई हैं. भाजपा ने गोरखपुर से चुनाव लड़ चुके मनोज तिवारी को दिल्ली में अहम भूमिका दी हुयी है, वे ही आगामी विधानसभा चुनाव में निरहुआ जैसे तमाम स्टार प्रचारकों का बंदोबस्त करेंगे. कांग्रेस ने पहले ही पूर्वांचली समुदाय को आकर्षित करने के लिए पूर्व क्रिकेटर कीर्ति आजाद को प्रचार`समिति का प्रमुख बना रखा है. अब कांग्रेस इस रण में शत्रुघ्न सिन्हा को भी उतार पूर्वांचलियों को पार्टी से जोड़ने की जिम्मेदारी सौंपी है. शत्रुघ्न खुद पूर्वांचली समुदाय से आते हैं और उनके बीच काफी लोकप्रिय भी हैं. भाजपा और कांग्रेस को देखते हुये आप ने भी इंतज़ाम करन शुरू किया है , 2015 में पूर्वांचलियों ने एक मुश्त केजरेवाल को वोट देकर जितया था, यह बात केजरीवाल बह्ली भांति जानते हैं. पूर्वांचली बहुल आबादी वाली सीटों पर भोजपुरी फिल्म या संगीत इंडस्ट्री की लोकप्रिय हस्तियों को भी मैदान में उतारने की योजना बनाई जा रही है. कुछ भोजपुरी स्टारों से संपर्क भी किया गया है.
दिल्ली में विधानसभा चुनाव की घोषणा होने वाली है. खास बात यह है कि राजधानी दिल्ली पर इस बार पूर्वांचलियों का दबदबा है. पिछले कुछ बरसों से बढता हुआ यह दबदबा इस स्तर पर पहुंच गया है कि दिल्ली की सियासत में डेढ़ दशक पहले तक पंजाबी और वैश्य समुदाय का दबदबा हुआ करता था. लेकिन बीते कुछ चुनावों से पूर्वांचलियों ने इनके दबदबे को खत्म कर दिया है आज दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में करीब 27 से 30 सीटें ऐसी हैं, जहां पर पूर्वांचली मतदाताओं की भूमिका निर्णायक मानी जाती है. इन सीटों पर 35 से 45 प्रतिशत वोटर पूर्वांचली हैं. राजनीतिक प्रेक्षकों का आकलन है कि निकट भविष्य में दिली का हर दूसरा मतदाता पूर्वांचली होगा. संसदीय चुनाव में दिल्ली की उत्तर-पूर्वी संसदीय सीट पर करीब 28 से 30 फीसदी, पश्चिमी दिल्ली संसदीय सीट पर तकरीबन 20 से 22 प्रतिशत, चांदनी चौक पर करीब 18 से 20 फीसदी, पूर्वी दिल्ली पर करीब 16 से 20 फीसदी और दक्षिणी दिल्ली पर करीब 15 से 17 फीसदी मतदाता पूर्वांचल से ताल्लुक रखते हैं. बीते लोकसभा चुनाव में दिल्ली में करीब 1 करोड़ 38 लाख मतदाता थे. वहीं, साल 2009 के लोकसभा चुनाव में वोटरों की संख्या तकरीबन 1 करोड़ 9 लाख थी. मतदाताओं की संख्या में जो तेजी आई है, उसमें 65 से 70 फीसदी मतदाता पूर्वांचली हैं.