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श्रेय देना नहीं, सिर्फ लेना जानती है मोदी सरकार

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार का नारा है – ‘सबका साथ, सबका विश्वास’. यह साथ और विश्वास तो सबका चाहती है लेकिन श्रेय देना नहीं, बल्कि श्रेय लेना भी स्वयं ही चाहती है. प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा तमाम तरह के सोशल मीडिया के प्लेटफार्म पर यह सुविधाएं दी गई है कि देशवासी देश के निर्माण में अपना योगदान देने के लिए सीधे प्रधानमंत्री ने जुड़ कर सलाह-सुझाव दे सकते हैं.

श्रीराजेश
Cult Current
04 May 2020
Solar farm during sunset

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार का नारा है – ‘सबका साथ, सबका विश्वास’. यह साथ और विश्वास तो सबका चाहती है लेकिन श्रेय देना नहीं, बल्कि श्रेय लेना भी स्वयं ही चाहती है. प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा तमाम तरह के सोशल मीडिया के प्लेटफार्म पर यह सुविधाएं दी गई है कि देशवासी देश के निर्माण में अपना योगदान देने के लिए सीधे प्रधानमंत्री ने जुड़ कर सलाह-सुझाव दे सकते हैं. यह किसी भी देशवासी के लिए अच्छी बात होती है कि उसकी सलाह उसके प्रधानमंत्री द्वारा सुनी जाती है. लेकिन बदले में देशवासी यह भी चाहता है कि प्रधानमंत्री अगर उसकी सलाह पर कोई पहल करते हैं तो उसका श्रेय भी उसे दें, ताकि वह और उसके जैसे लोग उत्साहित हो कर राष्ट्रनिर्माण के कार्य में और बढ़-चढ़ कर आगे आएं. आम नागरिक की सक्रिय सहभागिता सफल परिपक्व लोकतंत्र का अहम लक्षण है. यहां इसी संदर्भ में नीचे कुछ उदाहरण हैं.



एक



जब वैश्विक महामारी कोविड 19 की वजह से दुनिया के साथ-साथ भारत भी इसकी चपेट में आया और प्रधानमंत्री ने 24 मार्च को राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की घोषणा की तो पूरे राष्ट्र ने उनका समर्थन किया और सब लोग घरों में कैद हो गये. यह अभूतपूर्व अनुशासन था देशवासियों का. लेकिन घरों में रहने के बावजूद लोगों को खाद्य पदार्थों की आवश्यकता तो पड़ेगी. इसलिए कुछ आपात सेवाएं जारी रखी गई. उनमें से एक कार्य ऐसा था कि इसे भी जारी रखना आवश्यक था और वह कार्य था – खेती किसानी का. जब खेतों से फल-सब्जियों का उत्पादन नियमित होगा तभी सप्लाई चेन द्वारा लोगों के घरों तक आपूर्ति हो पाएगी. इसी बात को ध्यान में रख कर 25 मार्च को अखिल भारतीय किसान महासंघ (आइफा) के राष्ट्रीय संयोजक डॉ राजाराम त्रिपाठी ने प्रधानमंत्री कार्यालय को टैग करते हुए सुझाव दिया कि खेती के कार्य को लॉकडाउन से मुक्त रखा जाएं. न केवल फल-सब्जियों के लिए बल्कि यह समय रबी की फसल का है और यह फसल समय से खलिहान से गोदाम तक या किसानों के घर तक नहीं पहुंचे तो मंडियां विरान हो जाएंगी. डॉ त्रिपाठी की सलाह प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा तुरंत अमल में लाया गया औऱ 27 मार्च को गृह मंत्रालय के द्वारा संशोधित आदेश के जारी कर खेती के ज्यादातर कार्यों को लॉकडाउन से मुक्त कर दिया गया. हालांकि अलग-अलग राज्यों ने केंद्र सरकार के उन आदेशों की अपनी समझ और सुविधा के अनुसार अलग-अलग व्याख्या करते हुए उनका क्रियान्वयन समुचित ढंग से नहीं किया जिससे किसानों को अपूरणीय क्षति तथा अभूतपूर्व परेशानियां हुई, और अभी भी हो रही है, स्थानीय प्रशासन ने भी कोरोना को रोकने तथा कृषि कार्य को रोकने का अंतर समझने की कोशिश नहीं की और सुदूरवर्ती इलाकों में पुलिस अपना पराक्रम निरीह किसानों पर दिखाती रही.



दो



इसके पश्चात, केंद्र सरकार द्वारा गरीबों औऱ असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए तथा अन्य वर्गों के लिए जब विभिन्न प्रकार के राहत की घोषणाएं की गई तब देखा गया कि इन घोषणाओं में कृषि और कृषकों के लिए कोई बहुत सार्थक पैकेज नहीं है, जिससे लॉकडाउन से खेती को हुए नुकसान की भरपायी करते हुए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सके. इसे ध्यान में रखते हुए, 25 अप्रैल, 2020 को डॉ. त्रिपाठी द्वारा 52 किसान संगठनों से सलाह-मशविरा कर 25 सूत्री मार्गदर्शी सुझाव व मांग पत्र प्रधानमंत्री को सौंपा गया. इसके बाद भारत सरकार ने देश की खेती तथा किसानी के महत्व को समझते हुए, आने वाले भविष्य में देश की अर्थव्यवस्था को स्थिरता देने के दृष्टिकोण से, गांव में खेती तथा किसानी के कार्य को सुचारू रूप से जारी रखने के लिए, सभी जरूरी सुरक्षा बचावों के निर्देशों के साथ , किसानों को कृषि कार्य संपादित करने हेतु जरूरी दिशा- निर्देश जारी किए हैं. यद्यपि शहरी तथा अर्ध शहरी क्षेत्रों का सरकारी अमला अभी भी शासन की इस मंशा को भलीभांति नहीं समझ पाया है, अभी भी जिला एवं तहसील स्तर पर कई जगहों पर अफरा-तफरी का माहौल बना हुआ है. अभी भी किसानों को रोक रहे हैं. फिर भी मोटे तौर पर हम कह सकते हैं कि शासन की इस निर्देश से जिससे धीरे-धीरे देश के कई हिस्सों में गांवों में अब कृषि कार्य पटरी पर लौटने लगी है.