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विकास की राह पर छूटे गांव

जीवन की हरीतिमा से आच्छादित झारखंड की लाल मिट्टी, आज आदिवासियों के दर्द और लाचारी की गवाह बनी हुई है। यहाँ, विकास की किरणें अब तक नहीं पहुँची हैं, और आदिवासी समुदाय, सदियों से अपनी जड़ों से जुड़े रहने के बावजूद, आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित हैं।

जलज श्रीवास्तव
Cult Current
31 Mar 2025
Solar farm during sunset
स्वतंत्र पत्रकार आनंद दत्त ने इंडियास्पेंड के लिए अपनी मार्मिक लेखनी से झारखंड की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है। उनकी रिपोर्ट, “झारखंड: खाट की बैसाखी पर टिका आदिवासियों का स्वास्थ्य,” विश्व की पांचवीं अर्थव्यवस्था होने का दर्प भरने वाले भारत को यथार्थ का दर्पण दिखाती है। एशिया की तीसरी शक्ति होने के गर्व से अभिभूत राष्ट्र को हाशिये पर पड़ी जिंदगियों को सँवारने का आह्वान करती है। अमरमुनि नागेसिया के असहनीय कष्ट के माध्यम से, यह रिपोर्ट हर विकास सूचकांक को कड़वी सच्चाई से अवगत कराती है। इंडियास्पेंड के पोर्टल पर 18 दिसंबर, 2024 को प्रकाशित होने के तीन महीने बाद भी, स्थितियों में रंचमात्र भी परिवर्तन नहीं हुआ है। तेज बहादुर और विकास आर्यन की संवेदी तस्वीरों ने इस रिपोर्ट को जीवंत कर लोगों की संवेदनाओं को झकझोरने का प्रयास किया है। यह सिर्फ अमरमुनि की कहानी नहीं है, बल्कि उन हजारों आदिवासी परिवारों की व्यथा है जिनके लिए स्वास्थ्य सेवाएँ एक स्वप्न मात्र हैं। इसी उद्देश्य से, हम इस कहानी को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने के लिए पुनः साभार परिमार्जित संस्करण प्रकाशित कर रहे हैं, ताकि यह विडंबना व्यापक स्तर पर संज्ञान में आए...


 



जीवन की हरीतिमा से आच्छादित झारखंड की लाल मिट्टी, आज आदिवासियों के दर्द और लाचारी की गवाह बनी हुई है। यहाँ, विकास की किरणें अब तक नहीं पहुँची हैं, और आदिवासी समुदाय, सदियों से अपनी जड़ों से जुड़े रहने के बावजूद, आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित हैं। यहाँ स्वास्थ्य सेवाएँ खाट की बैसाखी पर टिकी हैं, और हर दिन, हर गर्भवती महिला, मृत्यु के मुँह में झाँकती हुई, अपने बच्चे को जन्म देने की आस में एक अनिश्चित यात्रा पर निकलती है।

बीते 17 अक्टूबर, 2024 की सुबह, आठ महीने की गर्भवती अमरमुनि नागेसिया के लिए भी एक ऐसी ही सुबह थी। यह सुबह सिर्फ एक दिन की शुरुआत नहीं थी, बल्कि दो जिंदगियों को दांव पर लगाने का एक कठिन फैसला था। एक तरफ स्वयं अमरमुनि की जान थी, और दूसरी तरफ, उनकी कोख में पल रहा बच्चा, जो अभी दुनिया की रोशनी देखने को भी तरस रहा था। अमरमुनि ने अपने ढाई साल के बेटे को प्यार से खाना खिलाया, उसे नहीं पता था कि उसकी माँ आज एक ऐसी यात्रा पर जा रही है, जहाँ से वापसी की कोई गारंटी नहीं है। उसने खुद को तैयार किया, यह तैयारी किसी उत्सव के लिए नहीं, बल्कि एक भयावह यात्रा के लिए थी।

यह तैयारी थी, चार घंटे तक एक टोकरी में बैठकर अस्पताल जाने की। यह टोकरी, कोई आलीशान पालकी नहीं थी, बल्कि लकड़ी और रस्सी से बनी एक अस्थायी व्यवस्था थी, जिसे चार लोग बारी-बारी से अपने कंधों पर उठाकर ले जाने वाले थे। अमरमुनि के लिए यह कोई नई बात नहीं थी। ढाई साल पहले, जब उनका पहला बच्चा होने वाला था, तब भी उन्हें इसी तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ा था।

यह कहानी सिर्फ अमरमुनि की नहीं है, बल्कि झारखंड के उन हजारों आदिवासी परिवारों की है, जिनके लिए स्वास्थ्य सेवाएँ एक सपने से भी बढ़कर हैं। यह कहानी उस भारत की कड़वी सच्चाई है, जहाँ हर दसवां बच्चा बिना डॉक्टर, नर्स, दाई या किसी अन्य स्वास्थ्यकर्मी की मदद के पैदा होता है। यानी जन्म के समय उन्हें किसी भी तरह की स्वास्थ्य सुविधा नहीं मिलती है।

आदिवासी लोगों की बात करें तो स्थिति और भी भयावह है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2019-21 के आँकड़ों से पता चलता है कि आदिवासी समुदाय में लगभग हर छठा बच्चा बिना किसी प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी की मदद के पैदा होता है। झारखंड में 32 जनजातियाँ निवास करती हैं, जिनमें से आठ को विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों के रूप में वर्गीकृत किया गया है। यहाँ ऐसे बच्चों के जन्म की संख्या पूरे देश में पाँचवें नंबर पर सबसे ज़्यादा है।

भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) की 2017 की एक रिपोर्ट के अनुसार, “स्वास्थ्य सेवाओं की अनुपस्थिति और परिवहन की कमी के कारण कमजोर जनजातियाँ समय पर स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित रह जाती हैं।” साल 2011 की जनगणना के अनुसार, राज्य में जनजातीय लोगों की आबादी 8.6 मिलियन है, जो राज्य की आबादी का 26% है। यह राष्ट्रीय आँकड़े 8.6% से तीन गुना ज़्यादा है।

अमरमुनि नागेसिया के पिता, सुखदेव नगेसिया, और गाँव के ही दो लोगों ने लकड़ी की टोकरी से पालकी बनाई और उसे रस्सियों से बाँस पर बाँध दिया। अमरमुनि को प्रसवपूर्व जाँच के लिए उनके गाँव से लगभग सात किलोमीटर दूर महुआडांर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाना था। किसान जनजाति की 26 वर्षीय अमरमुनि नगेसिया अपने दूसरे बच्चे को जन्म देने वाली थीं।

झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 178 किलोमीटर दूर, लातेहार जिले के महुआडांर ब्लॉक के जंगलों के बीचोबीच ग्वालखार गाँव बसा है। गाँव की आबादी लगभग 1,500 है, जिसमें ज़्यादातर लोग किसान, कोरवा और बिरिजिया जनजाति के हैं। इन समुदायों के लिए महुआडांर जाने का मतलब है, उन खतरनाक रास्तों से होते हुए निकलना, जहाँ पर कोई साइकिल तक नहीं चलती है। बारिश और खराब मौसम की स्थिति में यह रास्ता और भी जोखिम भरा हो जाता है।

“ट्राइबल हेल्थ इन इंडिया” रिपोर्ट के अनुसार, 81.8% जनजातीय महिलाओं को प्रसवपूर्व केवल एक जाँच मिलती है, वहीं केवल 15% जनजातीय महिलाओं को तीन प्रसवपूर्व जाँच मिल पाती हैं। यह देश में किसी भी समुदाय के बीच सबसे कम दर है।

अमरमुनि टोकरी में बैठ जाती हैं, और गाँव के दो लोग उसे उठाकर चल देते हैं। बड़े-बड़े पत्थर, तो कहीं कंटीले झाड़, पहाड़ की चढ़ाई को पार करना आसान नहीं है। लगभग दो घंटे लगातार चलने के बाद सब लोग एक जगह रुककर थोड़ा आराम करते हैं। थकान से चूर, उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ़ दिखाई दे रही थीं।

सुखदेव कहते हैं, “यहाँ हालात बहुत खराब हैं। बीती रात हुई बारिश ने रास्ते को और भी फिसलन भरा बना दिया है। अगर कोई फिसल गया, तो पता नहीं, माँ और बच्चे का क्या होगा।” उनकी आवाज़ में डर और लाचारी साफ़ झलक रही थी।

स्थानीय स्वास्थ्य सहिया, प्यारी नेगेसिया कहती हैं, “झारखंड में यह स्थिति आम है। यहाँ, खासकर जंगलों में रह रहे आदिवासी समुदायों के लिए स्वास्थ्य केंद्र पहुँच से काफ़ी दूर हैं।” प्यारी, जो खुद इसी समुदाय से आती हैं, इन मुश्किलों को अपनी आँखों से देखती आ रही हैं।

ग्वालखार में मई 2023 की एक घटना को याद करते हुए, 46 वर्षीय स्वास्थ्य सहिया ने बताया कि एक महिला ने घर पर ही बच्चे को जन्म दिया। उसे बहुत ज़्यादा रक्तस्राव होने लगा, तो उसे महुआडांर के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया। उसकी हालत गंभीर थी, इसलिए उसे वहाँ से लगभग 90 किलोमीटर दूर लातेहार के जिला अस्पताल में रेफर कर दिया गया। लेकिन बहुत ज्यादा रक्तस्राव के कारण अस्पताल में ही उसकी मौत हो गई। प्यारी की आँखों में उस दिन का दर्द आज भी ताज़ा है।

प्यारी ने बताया, “तीन साल पहले एक और महिला को प्रसव के दौरान बहुत दर्द होने पर, इसी तरह टोकरी में लादकर अस्पताल ले जाया गया था। प्रसव पीड़ा तेज हो जाने पर, उसे गाँव की महिलाओं की मदद से बीच जंगल में बच्चे को जन्म देना पड़ा।”

“ट्राइबल हेल्थ इन इंडिया” रिपोर्ट के अनुसार, एक चौथाई से ज़्यादा, यानी 27% आदिवासी महिलाएँ घर पर ही बच्चे को जन्म देती हैं, जो सभी जनसंख्या समूहों में सबसे अधिक है।

चार घंटे लंबे इस फिसलन भरे पहाड़ी रास्ते पर अमरमुनि के साथ रहीं प्यारी ने बताया कि ऐसी स्थिति चाईबासा, गुमला, साहिबगंज, पाकुड़, सिमडेगा, खूंटी और यहाँ तक कि राज्य की राजधानी रांची जैसे इलाकों में भी आम है। इन इलाकों में रहने वाले आदिवासी लोग अक्सर चिकित्सा सुविधाओं के लिए ऐसे मुश्किल रास्तों और दूसरे आदिवासियों की मदद पर निर्भर रहते हैं। यह एक दुष्चक्र है, जहाँ गरीबी और अभाव, स्वास्थ्य सेवाओं से दूरी और मृत्यु का कारण बन जाते हैं।

यह पूछे जाने पर कि स्वास्थ्य केंद्र तक पहुँचने की यह समस्या कब से है, सुखदेव बताते हैं, “दो या तीन पीढ़ियों से ज़्यादा समय से ऐसा ही चलता आ रहा है। सड़क का न होना हमेशा से समस्या रहा है। हम लगातार सड़क की माँग करते आ रहे हैं, लेकिन स्थिति जस की तस है। सड़क न होने की वजह से लोग मरते हैं। हमारे गाँव के तीन या चार बच्चे पहले ही मर चुके हैं। साल 2021 में मेरी पत्नी को लकवा मार गया। हमारे पास इलाज के लिए पैसे नहीं थे, तो वह भी मर गई। हम क्या कर सकते हैं?” सुखदेव का सवाल एक चीख है, जो विकास के दावों पर सवाल उठाती है।

ये चुनौतियाँ सिर्फ़ झारखंड तक ही सीमित नहीं हैं। बीते 27 सितंबर को आंध्र प्रदेश के पिंजरीकोंडा गाँव की एक गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाने के लिए उफ़नते बाँध से एक नाले को पार करना पड़ा था। हर साल, ऐसे कई मामले सामने आते हैं, जो देश के दूरदराज के इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली को उजागर करते हैं।

ग्वालखार जैसे वन गाँवों में सड़कों का अभाव नौकरशाही और पर्यावरण नियमों के बीच फँसा मसला है। विकास और पर्यावरण के बीच एक जटिल संघर्ष है, जिसमें आदिवासी समुदाय सबसे अधिक प्रभावित होता है।

वन और आदिवासी अधिकारों के लिए काम करने वाले 17 छोटे-बड़े स्वयंसेवी संगठनों के मंच, झारखंड वन अधिकार मंच (जेवीएएम), और इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस द्वारा किए गए 2021 के एक संयुक्त सर्वेक्षण में पाया गया कि झारखंड में वन क्षेत्रों में 14,850 गाँव हैं।

झारखंड वन अधिकार मंच के संयोजक, सुधीर पाल के अनुसार, अगर प्रति गाँव 100 लोगों को भी लिया जाए, तो इस अनुमान के साथ भी लगभग 14.8 लाख लोग इन दूरदराज के क्षेत्रों में रहते हैं, और उनमें से कई आपात स्थिति में अस्पतालों तक पहुँचने के लिए खाट जैसे अस्थायी परिवहन पर निर्भर रहने के लिए मजबूर हैं।

हाल ही में झारखंड में हुए विधानसभा चुनावों में, कई लोगों ने बुनियादी ढाँचा मुहैया कराने में सरकार की विफलता का विरोध करते हुए चुनावों का बहिष्कार करने का फ़ैसला किया था। उदाहरण के लिए, बोकारो जिले के टुंडी निर्वाचन क्षेत्र के बामनाबाद गाँव और गिरिडीह जिले के बेंगाबाद ब्लॉक के ताराटांड गाँवों को ही लें। यहाँ के निवासियों ने वन गाँवों की श्रेणी में नहीं आने के चलते चुनाव का बहिष्कार किया। यह बहिष्कार, सिस्टम के प्रति आक्रोश और बदलाव की आस का प्रतीक था।

पर्यावरण मंत्रालय ने दिसंबर 2023 में संसद को बताया कि भारत में लगभग 6,50,000 गाँव हैं, जिनमें से 1,70,000 गाँव जंगलों के पास स्थित हैं। लगभग 30 करोड़ लोग अपनी आजीविका के लिए वनों पर निर्भर हैं। वन और पर्यावरण मंत्रालय के बीच समन्वय की कमी, इन गाँवों में विकास की राह में एक बड़ी बाधा है।

संसद में साल 2021 में दिए गए जवाब में कहा गया था कि झारखंड के आदिवासी इलाकों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों के 142 पद खाली पड़े हैं। केंद्रीय बजट 2023-24 में 42 मंत्रालयों/विभागों के कुल योजना बजटीय आवंटन में से अनुसूचित जनजातियों के लिए विकास कार्य योजना (DAPST) निधि के रूप में 1,17,944 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। बजट आवंटन तो होता है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर उसका कार्यान्वयन एक बड़ी चुनौती है।

हालिया विधानसभा चुनाव 2024 में, झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) दोनों के घोषणापत्रों में राजनीतिक वादे किए गए। इसमें 5,000 परिवारों पर एक एम्बुलेंस, प्रत्येक पंचायत में एक स्वास्थ्य उप-केंद्र, स्वास्थ्य कर्मियों के मानदेय में 50 फीसदी की वृद्धि और स्वास्थ्य सेवा में सुधार के लिए पर्याप्त धनराशि आवंटित करने जैसे वादे शामिल थे। चुनावों के दौरान किए गए वादे, अक्सर चुनावी जुमले बनकर रह जाते हैं, और आदिवासी समुदाय, हर बार नई उम्मीदों के साथ ठगा हुआ महसूस करता है।