ईरान पर परमाणु प्रसार का आरोप लगाते हुए इजराइल ने ईरान पर जो हमला किया उसमें अमेरिका भी ना-नुकर के साथ शामिल हुआ। क्या कुछ घंटों का युद्ध ईरान के परमाणु बम बनाने की क्षमता को खत्म कर दिया है या फिर कुछ महीनों या सालों के बाद उसका परमाणु कार्यक्रम पुनर्जीवित हो उठेगा? या एक सवाल यह भी उठता है कि क्या क्षेत्रीय प्रतिरोध को कुचलने, प्रभुत्व सुनिश्चित करने, और एक उपनिवेशवादी व्यवस्था को बनाए रखने के लिए ईरान के साथ वहीं छल दोहराया जा रहा है जो जो इराक के विनाश का कारण बना था? इराक से लेकर ईरान तक, "स्वतंत्रता" और "लोकतंत्र" जैसे शब्द कहीं गहरे साम्राज्यवादी मंसूबों को छिपाने के लिए तो इस्तेमाल नहीं किये जा रहे हैं....
इज़राइल ने दावा किया कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम से उसका अस्तित्व खतरे में है। यह दलील 2003 में अमेरिका द्वारा इराक पर हमले के लिए इस्तेमाल की गई रणनीति की याद दिलाती है—"सामूहिक विनाश के हथियार" का हवाला, जो बाद में मिथ्या सिद्ध हुआ। इज़राइल ने एकतरफा सैन्य कार्रवाई कर अंतरराष्ट्रीय कानून और वैश्विक जनमत की उपेक्षा की।
इज़राइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू के नेतृत्व में किया गया यह हमला 'पूर्व-सावधानी' के नाम पर न्यायोचित ठहराया जा रहा है, जबकि वस्तुतः यह पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन को तोड़ने और वर्चस्व स्थापित करने की एक साज़िश है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) की रिपोर्टों के अनुसार, ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को शांतिपूर्ण उद्देश्यों तक सीमित रखने की प्रतिबद्धता जताई है, फिर भी इजराइल के संदेह और सैन्य कार्रवाइयां क्षेत्र को अस्थिर करने का काम कर रही हैं।
अमेरिका की भूमिका एक बार फिर दोमुंही रही है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियाँ मानती हैं कि ईरान परमाणु हथियारों से अभी दूर है, जबकि राजनीतिक नेतृत्व इज़राइल के दावों को समर्थन देता रहा। यह विरोधाभास अमेरिका की रणनीतिक असमंजस नहीं, बल्कि सोची-समझी चाल का हिस्सा लगता है, जिसमें वह पश्चिम एशिया में तनाव बनाए रखकर हथियारों का व्यापार, कूटनीतिक हस्तक्षेप और अपने सैन्य ठिकानों की मौजूदगी को कायम रखना चाहता है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (एसआईपीआरआई) के अनुसार, अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा हथियार निर्यातक है, और पश्चिम एशिया उसके हथियारों का एक महत्वपूर्ण बाजार है।
डोनाल्ड ट्रंप की दोबारा अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में वापसी वैश्विक कूटनीति के परिदृश्य में एक तीव्र मोड़ का संकेत देती है। ट्रंप की विदेश नीति का मूल स्वर हमेशा ‘अमेरिका फर्स्ट’ रहा है, जिसकी परिणति अक्सर बहुपक्षीय समझौतों से हटने, साझेदार देशों पर दबाव बढ़ाने और विरोधी राष्ट्रों के खिलाफ आर्थिक व सैन्य धमकियों के रूप में हुई है।
ट्रंप प्रशासन ने 2018 में ईरान परमाणु समझौते (जेसीपीओए) से एकतरफा हटकर ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाए थे। यह कदम न केवल एक कूटनीतिक असफलता थी, बल्कि उसने पश्चिम एशिया को अस्थिरता के नए दौर में धकेल दिया। ट्रंप की दृष्टि में ईरान "सभी बुराइयों की जड़" है, जबकि इज़राइल उनका प्राथमिक सहयोगी। इस अतिवादी वर्गीकरण ने अमेरिकी नीति को और अधिक पक्षपाती बना दिया है।
2025 में ट्रंप की वापसी के बाद एक बार फिर यह डर सतह पर आ गया है कि अमेरिका ईरान के साथ किसी भी समझौते की दिशा में नहीं जाएगा। उनकी टीम में शामिल कुछ व्यक्तित्व को भले ही प्रगतिशील कहा जाता हों, लेकिन विदेश नीति में ट्रंप का रवैया अब भी कठोर राष्ट्रवाद और शक्ति के प्रयोग की वकालत करता है।
उनकी इस सोच में बहुपक्षीय संगठनों की भूमिका गौण होती है और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं को वे अमेरिका की ‘बाधा’ मानते हैं। यदि यही सोच पश्चिम एशिया में लागू होती है, तो आने वाले वर्षों में इज़राइल को खुली छूट मिल सकती है और ईरान पर सैन्य कार्रवाई को ‘वैध ठहराने’ का अमेरिकी प्रयास फिर तेज़ हो सकता है।
वहीं दूसरी ओर, चीन ने इस पूरे प्रकरण में न केवल ईरान की संप्रभुता का समर्थन किया, बल्कि इज़राइल की सैन्य कार्रवाई की निंदा करते हुए इस संकट का शांतिपूर्ण समाधान सुझाया। चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपात बैठक में स्पष्ट रुख अपनाते हुए इसे 'सैन्य दुस्साहसिकता' और क्षेत्रीय शांति के लिए 'गंभीर खतरा' बताया।
चीन ने ईरानी और इज़राइली विदेश मंत्रियों से अलग-अलग बात कर यह भी स्पष्ट कर दिया कि वह क्षेत्रीय स्थिरता में रुचि रखता है, न कि सैन्य टकराव में। यह कूटनीति चीन की बहुपक्षीय अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण को रेखांकित करती है। चीन की इस पहल को वैश्विक समुदाय में व्यापक समर्थन मिला है।
ईरान और चीन के बीच 2021 में हुआ 25-वर्षीय रणनीतिक सहयोग समझौता, जिसमें ऊर्जा, व्यापार, आधारभूत ढांचा, तकनीक और रक्षा शामिल हैं, इस क्षेत्र में एक नया ध्रुव उभरने की ओर संकेत करता है। चीन, अमेरिका के प्रतिबंधों के बावजूद, ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बना हुआ है और उसके लगभग 70% तेल का आयात करता है (जनवरी 2024 तक)।
हालाँकि इस साझेदारी में चुनौतियाँ भी हैं — अधूरी परियोजनाएँ, तकनीकी सीमाएँ और क्षेत्रीय अस्थिरता। लेकिन चीन का समर्थन ईरान के लिए एक वैश्विक मंच पर सामरिक ढाल का कार्य करता है। यह समर्थन ईरान को अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना करने में मदद करता है।
ईरान पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। 2015 में बना जॉइंट कॉम्प्रिहेन्सिव प्लान ऑफ एक्शन (जेसीपीओए) इसका प्रमाण है, जिसे ट्रंप प्रशासन ने 2018 में एकतरफा छोड़ दिया था। अब ट्रंप की वापसी के बाद यह आशंका बनी हुई है कि अमेरिका फिर से ईरान पर दबाव बनाएगा, जिससे पश्चिम एशिया में नया संकट पैदा हो सकता है।
मार्च 2025 में चीन, रूस और ईरान के उप-विदेश मंत्रियों की बीजिंग बैठक में जेसीपीओए आधारित समाधान और अमेरिका के एकतरफा प्रतिबंधों की आलोचना की गई। यह पहल न केवल एक कूटनीतिक संतुलन प्रस्तुत करती है, बल्कि पश्चिमी प्रभाव को संतुलित करने का प्रयास भी है।
भारत के लिए ट्रंप एक दोधारी तलवार की तरह हैं। एक ओर, वह चीन-विरोधी रणनीति में भारत को साझेदार बनाना चाहते हैं, दूसरी ओर, पश्चिम एशिया में उनकी अतिवादी नीति भारत की ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी सुरक्षा और व्यापार मार्गों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है। भारत की रणनीति को इसलिए अधिक सतर्क और संतुलित होना होगा—ना तो अमेरिकी खेमे में पूरी तरह झुकना, और ना ही ईरान जैसे ऐतिहासिक साझेदारों को खो देना।
भारत पारंपरिक रूप से ईरान और इज़राइल दोनों का साझेदार रहा है। चाबहार बंदरगाह परियोजना और ऊर्जा साझेदारी में भारत की भागीदारी ईरान के साथ उसके संबंधों को रणनीतिक गहराई देती है। वहीं रक्षा तकनीक, साइबर सुरक्षा और कृषि तकनीक में इज़राइल के साथ भारत का सहयोग सुदृढ़ है।
परंतु जब बात पश्चिम एशिया में तनाव की आती है, तो भारत का रुख स्पष्ट और संतुलित रहा है — “संप्रभुता का सम्मान, अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन, और संघर्ष का कूटनीतिक समाधान।” भारत को न केवल इस क्षेत्र में रहने वाले लाखों भारतीयों की सुरक्षा की चिंता रहती है, बल्कि वैश्विक तेल आपूर्ति और व्यापारिक मार्गों की स्थिरता भी उसके लिए प्रमुख विषय है।
ईरान और खाड़ी देशों से भारत को होने वाली तेल और गैस आपूर्ति पर कोई संकट, भारत की अर्थव्यवस्था पर प्रत्यक्ष प्रभाव डाल सकता है। खाड़ी और पश्चिम एशिया में करोड़ों भारतीय कामगार हैं। क्षेत्रीय युद्ध या अस्थिरता से उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2023 में लगभग 80 लाख भारतीय नागरिक खाड़ी देशों में कार्यरत थे। भारत को अमेरिका, इज़राइल, ईरान, और चीन — चारों के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाना होता है। अतः भारत किसी भी एक पक्ष का अंध समर्थन नहीं कर सकता। अब यह स्पष्ट होता जा रहा है कि पश्चिम एशिया में किसी भी समस्या का सैन्य समाधान नहीं है। अमेरिका और इज़राइल की एकतरफा कार्रवाइयाँ केवल अस्थिरता को बढ़ा रही हैं। वहीं चीन जैसे देश शांतिपूर्ण समाधान की राह सुझा रहे हैं, जो भारत की 'वसुधैव कुटुम्बकम्' और 'शांति के सह-अस्तित्व' की परंपरा से मेल खाती है।
ईरान ने इजराइल और अमेरिकी सैन्य कार्रवाइयों का जवाब दिया है, लेकिन जवाबी कार्रवाई का स्तर सीमित रहा है। यह आवश्यक है कि वैश्विक मंचों पर उसकी संप्रभुता और अधिकारों की रक्षा के लिए आवाज़ उठाई जाए। यह भारत जैसे लोकतांत्रिक और बहुध्रुवीयता समर्थक राष्ट्र की भूमिका हो सकती है कि वह वैश्विक मंचों पर ऐसे टकरावों की कूटनीतिक रोकथाम के लिए पहल करे।
ईरान और इज़राइल के टकराव ने फिर यह दिखा दिया है कि अराजकता को एक रणनीति की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है — एक ऐसा औजार जो युद्ध को नहीं, बल्कि प्रभुत्व की पुनःस्थापना को लक्ष्य बनाता है। भारत को इस वैश्विक पटल पर अपनी आवाज़ को मजबूती से रखते हुए यह स्पष्ट करना होगा कि सैन्य टकरावों की नहीं, शांति और सहयोग की सदी की आवश्यकता है। यह वही दृष्टिकोण है जो भारत को वैश्विक नेतृत्व की ओर ले जा सकता है — न्याय, संतुलन और समरसता के पथ पर। भारत को न केवल पश्चिम एशिया में बल्कि दुनिया भर में शांति और स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए एक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।