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मतदाता सूची का विशेष संशोधन: गरमाने लगी है 2026 के बंगाल चुनाव से पहले सियासत

2025 की इस बरसाती जुलाई में, जब पश्चिम बंगाल में राजनीतिक दल अपनी-अपनी बिसात बिछा रहे हैं, देश का चुनाव आयोग (ECI) एक बड़े अभियान में जुटा है — Special Intensive Revision (SIR), यानी मतदाता सूचियों का विशेष गहन संशोधन।

श्रेया गुप्ता
Cult Current
11 Jul 2025
Solar farm during sunset

2025 की इस बरसाती जुलाई में, जब पश्चिम बंगाल में राजनीतिक दल अपनी-अपनी बिसात बिछा रहे हैं, देश का चुनाव आयोग (ECI) एक बड़े अभियान में जुटा है — Special Intensive Revision (SIR), यानी मतदाता सूचियों का विशेष गहन संशोधन।



सिर्फ बंगाल ही नहीं, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी जैसे राज्यों में भी यह प्रक्रिया शुरू हो चुकी है — उन राज्यों में, जहाँ 2026 में विधानसभा चुनाव होने हैं।



चुनाव आयोग का कहना है कि इसका उद्देश्य है — मतदाता सूचियों को अद्यतन और पारदर्शी बनाना।



लेकिन विपक्ष पूछ रहा है — यही वक़्त क्यों? और मंशा क्या है?



क्यों ज़रूरी है मतदाता सूची में सफ़ाई?



आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, बंगाल समेत इन राज्यों में लाखों ऐसे नाम दर्ज हैं, जो या तो दोहराए गए हैं, या जिनमें त्रुटियाँ हैं — जैसे गलत पता, गलत उम्र, या मृतकों के नाम अब भी सूची में मौजूद।



चुनाव आयोग के मुताबिक, लोकतंत्र की नींव एक साफ़ और भरोसेमंद मतदाता सूची ही है — जिससे फर्जी वोटिंग रुके, सही लोगों को वोट देने का अधिकार मिले, और चुनाव की पारदर्शिता पर कोई सवाल न उठे।



बीते लोकसभा चुनाव के दौरान भी कई जिलों में शिकायतें आई थीं कि एक ही परिवार के दो सदस्यों के नाम दो बार दर्ज हो गए, या किसी प्रवासी मज़दूर का नाम दो अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में दर्ज है।



इसलिए आयोग का कहना है — SIR एक नियमित प्रक्रिया है, इसमें कुछ भी नया या अचानक नहीं है।



तो राजनीति क्यों गरमा गई?



मुद्दा यह है कि बंगाल, असम, केरल जैसे राज्यों में इस विशेष संशोधन को लेकर विपक्षी पार्टियाँ सवाल उठा रही हैं।



तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि बंगाल में मतदाता सूची का यह अचानक संशोधन संदिग्ध है। उनका आरोप है कि सत्ताधारी पार्टी इसे कुछ इलाकों में वोट बैंक बदलने के लिए इस्तेमाल कर सकती है।



इसी तरह, असम में AIUDF और कांग्रेस ने आशंका जताई है कि NRC और नागरिकता जैसे संवेदनशील मुद्दों के बाद इस समय पर किया गया संशोधन सामाजिक अस्थिरता पैदा कर सकता है।



केरल में CPI(M) ने कहा है कि अगर संशोधन निष्पक्ष रूप से किया गया, तो उसका स्वागत है — लेकिन यह प्रक्रिया राजनीतिक हथियार नहीं बननी चाहिए।



विशेषज्ञों की राय: डर क्यों है?



चुनाव विश्लेषकों के अनुसार, भारत में मतदाता सूची का संशोधन कोई नई बात नहीं है — हर राज्य में यह हर कुछ वर्षों में होता ही है।



लेकिन 2026 में होने वाला बंगाल चुनाव बेहद सघन और ध्रुवीकृत माना जा रहा है।



2011 से बंगाल की सत्ता में TMC है, और भाजपा यहाँ अपनी पकड़ मज़बूत करने में लगी है। ऐसे में किसी भी तकनीकी प्रक्रिया को शक की नज़र से देखे जाना स्वाभाविक है।



इसके अलावा, डिजिटल वोटर कार्ड और आधार लिंकिंग जैसे कदमों को लेकर नागरिक अधिकार समूह पहले ही चिंता जता चुके हैं कि कहीं इनसे किसी विशेष समुदाय के मतदाता प्रभावित न हो जाएँ।



जनता की प्रतिक्रिया: भ्रम या भरोसा?



ग्रामीण इलाकों में लोग बता रहे हैं कि BLO (Booth Level Officer) घर-घर फॉर्म लेकर आ रहे हैं, लेकिन सभी को पूरी जानकारी नहीं दी जा रही।



कुछ इलाकों में लोगों को डर है कि कहीं उनका नाम गलती से सूची से हटा न दिया जाए।



कई लोग अभी भी डिजिटल अपडेट प्रक्रिया को लेकर असहज हैं — ख़ासकर उम्रदराज़ और अशिक्षित मतदाताओं को फॉर्म भरने में परेशानी हो रही है।



निष्कर्ष: पारदर्शिता की असली परीक्षा



देश में लोकतंत्र की सेहत केवल चुनाव आयोग के दावों पर नहीं, बल्कि जनता के भरोसे पर टिकी होती है।



अगर SIR प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और सबके लिए सहज रही, तो यह लोकतंत्र को और मज़बूती देगी।



लेकिन यदि इस प्रक्रिया में कहीं भी पक्षपात, तकनीकी खामी या नागरिकों की अनदेखी हुई, तो यही प्रक्रिया सियासत का नया हथियार बन सकती है।



आख़िरी सवाल:



क्या 2026 के बंगाल चुनाव से पहले किया जा रहा यह संशोधन लोकतंत्र को और पारदर्शी बनाएगा — या सियासी अविश्वास को और गहरा करेगा?



निर्णय जनता की जागरूकता और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर निर्भर करेगा।



श्रेया गुप्ता कल्ट करंट की प्रशिक्षु पत्रकार है। आलेख में व्यक्त विचार उनके

निजी हैं और कल्ट करंट का इससे सहमत होना अनिवार्य नहीं है।