Flash Cult Current
विज्ञान

इसरो (ISRO) के भविष्य और अंतरिक्ष क्षेत्र में निजीकरण पर विवाद

क्या ISRO को सीमित किया जा रहा है? <Br/>संसद और सार्वजनिक मंचों पर सरकार और विपक्ष के बीच भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के भविष्य को लेकर तीखी बहस देखने को मिली।

कल्ट करंट डेस्क
Cult Current
26 Aug 2026
Solar farm during sunset

संसद और सार्वजनिक मंचों पर सरकार और विपक्ष के बीच भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के भविष्य को लेकर तीखी बहस देखने को मिली। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने इसरो के कथित निजीकरण की कोशिशों पर चिंता जताई, जबकि केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने स्पष्ट किया कि देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम को सीमित करने के बजाय उसका विस्तार ("स्केलिंग अप") किया जा रहा है।



विपक्ष ने आरोप लगाया कि निजी कंपनियों को बढ़ावा देने से इसरो की भूमिका केवल अनुसंधान तक सीमित रह जाएगी। तमिलनाडु के कुलसेकरपट्टिनम में 1,000 करोड़ रुपये की लागत से विकसित हो रहे दूसरे स्पेसपोर्ट को निजी हाथों में सौंपने की योजना और हाल के महीनों में इसरो से 100-120 प्रमुख वैज्ञानिकों के जाने पर सवाल उठाए गए।



केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने विपक्ष के आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि इसरो कमजोर नहीं हो रहा, बल्कि उसे गगनयान, चंद्रयान-4, भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन और मंगल-शुक्र जैसे नए अभियानों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए सक्षम बनाया जा रहा है। उन्होंने तर्क दिया कि सालाना 50 रॉकेट लॉन्च के लक्ष्य को पूरा करने के लिए निजी उद्योग को विनिर्माण की जिम्मेदारी संभालनी होगी।



सरकार ने बताया कि भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में अब 440 से अधिक स्टार्टअप्स सक्रिय हैं। स्काईरूट एयरोस्पेस का 'विक्रम-1' निजी तौर पर विकसित पहला रॉकेट बना जिसने कक्षा में सफलता पाई। इसके अलावा, श्रीहरिकोटा स्पेसपोर्ट मुख्य अभियानों के लिए केंद्रीय भूमिका में बना रहेगा, जबकि कुलसेकरपट्टिनम छोटे उपग्रहों के वाणिज्यिक लॉन्च का प्रबंधन करेगा।



बहस का मुख्य बिंदु यह मॉडल है कि क्या इसरो को एक विनिर्माता के साथ-साथ एक मार्गदर्शक (मेंटॉर) बनना चाहिए। पिछले 60 वर्षों से इसरो खुद रॉकेट बना रहा था, लेकिन अब सरकार चाहती है कि इसरो भविष्य की तकनीकों के विकास पर ध्यान दे और निजी क्षेत्र को बड़े पैमाने पर रॉकेट विनिर्माण की अनुमति दे।