उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन ने एक बार फिर दुनिया को दहलाते हुए दुनिया के पहले आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से लैस अत्याधुनिक और हाइपर-स्पीड टॉरपीडो का सफल परीक्षण किया है। प्योंगयांग की सरकारी मीडिया के अनुसार, पिछले पाँच वर्षों में 180 से अधिक परीक्षणों के बाद विकसित की गई इस मारक प्रणाली में लक्ष्य का स्वतः पता लगाने और अचूक मार्गदर्शन के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उपयोग किया गया है। इस परीक्षण के बाद कोरियाई प्रायद्वीप में तनाव अपने चरम पर पहुँच गया है।
यह नया एआई-संचालित टॉरपीडो पानी के भीतर चुपचाप बेहद तेज गति से यात्रा करते हुए दुश्मन के विमानवाहक पोतों और पनडुब्बियों को सेकंडों में नेस्तनाबूद करने की क्षमता रखता है। पारंपरिक रडार और सोनार प्रणालियों के लिए इस प्रकार के स्वायत्त हथियारों को ट्रैक करना बेहद मुश्किल होता है। अमेरिकी और दक्षिण कोरियाई खुफिया एजेंसियां इस नई तकनीक के सामने आने के बाद आपातकालीन बैठकों में जुटी हैं।
प्योंगयांग का यह कदम तकनीकी रूप से उसके बढ़ते सैन्य कौशल और रूस के साथ उसकी हालिया रक्षा साठगांठ की ओर इशारा करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तर कोरिया को इस उन्नत एआई तकनीक और नौसैनिक मार्गदर्शन प्रणालियों को विकसित करने में विदेशी ताकतों से तकनीकी मदद मिली है। वाशिंगटन ने इस परीक्षण को अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानदंडों का खुला उल्लंघन करार दिया है।
क्षेत्रीय देश—दक्षिण कोरिया और जापान—इस खतरनाक हथियार के परीक्षण के बाद अत्यधिक सतर्क हो गए हैं। जापान ने अपने तटीय क्षेत्रों में नौसैनिक गश्त बढ़ा दी है और अपनी मिसाइल डिफेंस प्रणालियों को पूरी तरह सक्रिय कर दिया है। प्रशांत महासागर में सुरक्षा का यह नया संकट अमेरिकी सहयोगियों की रात्रिक की नींद उड़ाने के लिए काफी है।
भारतीय परिप्रेक्ष्य से यह तकनीक हिंद-प्रशांत क्षेत्र और दक्षिण चीन सागर में उभरते नए खतरों का संकेत देती है। चीन और उसके करीबी सहयोगी जैसे उत्तर कोरिया द्वारा हथियारों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जाना आने वाले समय में एशियाई समुद्रों की सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है। भारतीय नौसेना को भी अपनी पनडुब्बी-रोधी और जल के भीतर सुरक्षा प्रणालियों को एआई-सक्षम बनाने की जरूरत है।
इसके अलावा, उत्तर कोरिया, चीन और पाकिस्तान के बीच पनडुब्बी और मिसाइल तकनीक का जो गुप्त आदान-प्रदान होता रहा है, वह भारत की समुद्री सीमाओं के लिए चिंता का विषय है। हिंद महासागर में भविष्य के खतरों से निपटने के लिए भारत को अपनी रक्षा अनुसंधान और विकास (DRDO) क्षमताओं में स्वदेशी एआई तकनीक को और तेजी से शामिल करना होगा।
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