रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने की संभावनाओं वाले कानून को फिलहाल रोककर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वैश्विक ऊर्जा राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ पैदा कर दिया है। इस फैसले से भारत और चीन जैसे रूसी ऊर्जा के बड़े खरीदारों को संभावित अमेरिकी आर्थिक दंड से राहत मिलने के संकेत हैं। हालांकि, कानून पर रोक का अर्थ यह नहीं है कि रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों के खिलाफ भविष्य में प्रतिबंधों या टैरिफ का विकल्प पूरी तरह समाप्त हो गया है।
लिंडसे ग्राहम एक्ट के नाम से चर्चित इस कानून के तहत ट्रंप प्रशासन को रूस के ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र से जुड़े हितों तथा रूसी तेल और गैस के प्रमुख खरीदारों पर कठोर आर्थिक कार्रवाई करने का अधिकार दिया गया था। अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम इस विधेयक के प्रमुख प्रायोजक थे। सितंबर के मध्य में इस कानून पर हस्ताक्षर करने के बाद ट्रंप ने अब कार्यकारी आदेश के माध्यम से इसके प्रावधानों पर रोक लगाई है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को सूचित किया गया है कि मौजूदा परिस्थितियों में छूट देना अमेरिका के राष्ट्रीय हित में आवश्यक है।
भारत और चीन को क्यों मिल सकती है राहत?
भारत और चीन रूस के प्रमुख ऊर्जा खरीदारों में शामिल हैं। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने रूसी कच्चे तेल की खरीद जारी रखी। इसका प्रमुख कारण ऊर्जा आपूर्ति की स्थिरता, प्रतिस्पर्धी कीमतें और घरेलू ईंधन आवश्यकताएँ रही हैं।
अमेरिका की ओर से 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने की संभावना भारत के निर्यातकों के लिए गंभीर चुनौती बन सकती थी। इससे भारतीय उत्पादों की अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति प्रभावित होने और दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों में तनाव बढ़ने का जोखिम था।
अब कानून पर रोक से भारत को तत्काल संभावित दबाव से राहत मिल सकती है। हालांकि, यह राहत कितनी व्यापक और स्थायी होगी, इसका आकलन अमेरिकी प्रशासन के अगले फैसलों तथा भारत-रूस ऊर्जा व्यापार की वास्तविक स्थिति के आधार पर ही किया जा सकेगा।
भारत के लिए यह मामला केवल सस्ते तेल की खरीद तक सीमित नहीं है। यह उसकी रणनीतिक स्वायत्तता का प्रश्न भी है। नई दिल्ली लंबे समय से यह रुख अपनाती रही है कि उसकी ऊर्जा नीति का निर्धारण राष्ट्रीय हितों, बाजार की परिस्थितियों और उपभोक्ताओं की जरूरतों के आधार पर होना चाहिए।
अमेरिकी घरेलू राजनीति और ऊर्जा कीमतों का दबाव
ट्रंप के फैसले को समझने के लिए अमेरिका की घरेलू आर्थिक परिस्थितियों पर भी नजर डालना आवश्यक है। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में व्यवधान और तेल की बढ़ती कीमतें अमेरिकी उपभोक्ताओं पर दबाव डाल सकती हैं। ईंधन की कीमतों का सीधा असर परिवहन, उत्पादन और महंगाई पर पड़ता है।
नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले यह मुद्दा ट्रंप प्रशासन के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है। यदि रूस पर कठोर प्रतिबंधों के कारण अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में आपूर्ति घटती है और अमेरिकी उपभोक्ताओं को महंगा ईंधन खरीदना पड़ता है, तो सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठ सकते हैं।
इसी संदर्भ में रूस के साथ डीजल आपूर्ति से संबंधित संभावित समझौते की चर्चा महत्वपूर्ण हो जाती है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, प्रतिबंधों में राहत के बदले रूस से अंतरराष्ट्रीय बाजार में अतिरिक्त डीजल उपलब्ध कराने की संभावना पर विचार किया गया है। हालांकि, इस व्यवस्था की शर्तों और उसके वास्तविक क्रियान्वयन की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
इससे एक विरोधाभास भी सामने आता है। अमेरिका रूस की ऊर्जा आय सीमित करना चाहता है, लेकिन जब प्रतिबंधों के परिणामस्वरूप ऊर्जा की कीमतें बढ़ने का खतरा पैदा होता है, तो उसे अपने घरेलू आर्थिक हितों को भी प्राथमिकता देनी पड़ती है।
यूक्रेन के लिए झटका, रूस के लिए कूटनीतिक अवसर
ट्रंप के फैसले से यूक्रेन के लिए चिंताएँ बढ़ सकती हैं। चार वर्षों से अधिक समय से जारी युद्ध के बीच यूक्रेन को पश्चिमी वित्तीय और सैन्य सहायता की आवश्यकता बनी हुई है। राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने अगले वर्ष के लिए लगभग 80 अरब डॉलर की सहायता की जरूरत बताई है।
यदि रूस की ऊर्जा आय पर दबाव कम होता है, तो मॉस्को को अपने युद्ध संबंधी खर्चों के लिए अतिरिक्त आर्थिक गुंजाइश मिल सकती है। यही कारण है कि अमेरिकी फैसले की आलोचना करने वाले नेताओं का तर्क है कि प्रतिबंधों में ढील रूस को लाभ पहुँचा सकती है और यूक्रेन की स्थिति को कमजोर कर सकती है।
अमेरिकी सांसद डॉन बेयर ने इस फैसले को रूस के प्रति अनुचित नरमी बताते हुए कहा है कि इससे यूक्रेन के सहयोगियों को गलत संदेश जाएगा। दूसरी ओर, रूस ने इस कदम का स्वागत किया है। रूसी राष्ट्रपति के दूत किरिल दिमित्रीव ने इसे ऐतिहासिक घटनाक्रम बताते हुए दावा किया कि कठोर प्रतिबंध अमेरिकी अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय बाजार को नुकसान पहुँचा सकते थे।
इस बीच, रूस और यूक्रेन के बीच सैन्य संघर्ष जारी है। रूसी रिफाइनरियों पर यूक्रेनी हमलों तथा अमेरिकी समर्थन को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद इस संकट को और जटिल बनाते हैं।
भारत के लिए आगे की चुनौती
ट्रंप का यह फैसला भारत के लिए अवसर और अनिश्चितता, दोनों लेकर आया है। एक ओर रूसी तेल की खरीद पर संभावित दंड का तत्काल खतरा कम हो सकता है, दूसरी ओर अमेरिका की नीति में बदलाव यह संकेत देता है कि ऊर्जा और व्यापार संबंधी फैसले भू-राजनीतिक परिस्थितियों तथा घरेलू राजनीतिक दबावों से प्रभावित होते रहेंगे।
भारत को इस अवसर का उपयोग अपनी ऊर्जा आपूर्ति में विविधता बढ़ाने, घरेलू शोधन क्षमता मजबूत करने और प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने के लिए करना चाहिए।
अंततः, यह घटनाक्रम केवल रूस पर प्रतिबंधों की कहानी नहीं है। यह उस वैश्विक व्यवस्था की तस्वीर है, जिसमें सिद्धांतों, ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक हितों और चुनावी राजनीति के बीच लगातार संतुलन साधा जा रहा है। भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण चुनौती यही है कि वह बदलते अमेरिकी रुख के बीच अपने राष्ट्रीय हितों और रणनीतिक स्वायत्तता की रक्षा कैसे करता है।
लेखक Cult Current के सहायक संपादक हैं।
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