मध्य प्रदेश, दिल्ली और वैश्विक पटल से जुड़ी एक बड़ी खबर के अनुसार, मध्य पूर्व के होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी भयंकर तनाव और नौवहन संकट के कारण भारत को अपनी ऊर्जा आयातनीति में बड़ा आपातकालीन बदलाव करना पड़ा है। अंतर्राष्ट्रीय शिपिंग बाधित होने और अमेरिकी तथा पश्चिमी एलएनजी (LNG) आपूर्ति में अड़चन आने के बाद भारत ने वैकल्पिक रास्तों की तलाश तेजी से शुरू कर दी है।
ताजा सरकारी और व्यापारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत ने अपनी एलएनजी और ऊर्जा जरूरतों के लिए अपनी निर्भरता बदलते हुए ओमान को अपना सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बना लिया है। पिछले महीने अमेरिका को पीछे छोड़ते हुए ओमान ने भारत के प्रमुख ऊर्जा साझीदार के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर ली है, जिससे संकट के इस दौर में देश की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित हो रही है।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह भू-राजनीतिक बदलाव अत्यंत दूरगामी परिणाम वाला है। भारत अपनी कुल ऊर्जा आवश्यकताओं का दो-तिहाई से अधिक हिस्सा आयात करता है, और फारस की खाड़ी के रास्तों में किसी भी प्रकार की रुकावट से देश में ईंधन की कीमतों और बिजली उत्पादन पर संकट आ सकता था। ओमान के साथ मजबूत होते इस ऊर्जा गलियारे ने भारत को एक सुरक्षित और स्थिर विकल्प प्रदान किया है।
आर्थिक मोर्चे पर भी यह कदम भारतीय उद्योगों के लिए एक बड़ी राहत है। यदि भारत लंबी दूरी के महंगे वैकल्पिक स्रोतों पर निर्भर रहता, तो घरेलू बाजार में प्राकृतिक गैस और बिजली की कीमतें आसमान छूने लगतीं। ओमान से निकटता और सुगम समुद्री मार्ग के कारण ढुलाई लागत कम आई है, जिससे भारतीय मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को स्थिरता मिली है।
कूटनीतिक स्तर पर यह घटना इस बात को साबित करती है कि नई दिल्ली खाड़ी देशों के साथ अपने पारंपरिक और प्रगाढ़ संबंधों को कितनी खूबी से राष्ट्रीय हित में उपयोग कर रही है। भारत ने पश्चिम एशिया के उथल-पुथल भरे माहौल के बीच कूटनीतिक संतुलन साधते हुए यह दिखा दिया है कि देश की अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से कैसे बचाया जाना चाहिए।
यह घटना इस बात का प्रमाण है कि अनिश्चित वैश्विक भू-राजनीति के इस दौर में ऊर्जा विविधीकरण (Energy Diversification) ही किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत होती है। भारत की यह चुस्त और समय पर की गई कूटनीतिक व व्यावसायिक कार्रवाई अन्य विकासशील देशों के लिए भी एक मिसाल बन गई है।
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