अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक की वाशिंगटन में चल रही उच्चस्तरीय वार्ताओं से वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर एक बेहद डरावनी और सनसनीखेज रिपोर्ट सामने आई है। इस वैश्विक वित्तीय महाकुंभ में चेतावनी दी गई है कि दुनिया भर में बढ़ता हुआ सरकारी सार्वजनिक कर्ज (Global Public Debt) अब विकासशील और गरीब अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक बहुत बड़ा आर्थिक टाइम-बम बनता जा रहा है।
आईएमएफ की रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध, ऊर्जा संकट और वैश्विक मंदी से निपटने के लिए पिछले कुछ वर्षों में देशों द्वारा लिए गए भारी कर्जों के कारण ब्याज भुगतान का बोझ खतरनाक स्तर पर पहुँच चुका है। विकसित देशों की मौद्रिक नीतियों और ब्याज दरों में उच्चता के कारण उभरते बाजारों से पूंजी तेजी से बाहर निकल रही है, जिससे विकासशील देशों की वित्तीय स्थिरता खतरे में पड़ गई है।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह वैश्विक चेतावनी बहुत मायने रखती है। हालाँकि भारत की वृहद आर्थिक फंडामेंटल्स (Macroeconomic Fundamentals) और विदेशी मुद्रा भंडार अन्य विकासशील देशों की तुलना में काफी मजबूत हैं, लेकिन वैश्विक वित्तीय अस्थिरता का परोक्ष असर भारतीय रुपये की चाल और आयात बिल पर जरूर पड़ता है।
इस वैश्विक कर्ज संकट का सबसे बड़ा खतरा यह है कि जब सरकारें अपनी कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा केवल पुराने कर्जों के ब्याज चुकाने में खर्च कर देंगी, तो स्वास्थ्य, शिक्षा, बुनियादी ढांचे और गरीबी उन्मूलन जैसी जनहित की योजनाओं के लिए बजट सिकुड़ जाएगा। इससे वैश्विक स्तर पर असमानता और गरीबी बढ़ने की आशंका जताई गई है।
भारतीय वित्त मंत्री और नीति निर्माताओं ने वैश्विक मंचों पर बार-बार यह मुद्दा उठाया है कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों को विकासशील देशों के लिए आसान शर्तों पर ऋण और हरित वित्तपोषण (Green Finance) उपलब्ध कराना चाहिए, ताकि वे कर्ज के जाल में न फंसे।
यह वैश्विक रिपोर्ट मानवता के लिए एक गंभीर चेतावनी है कि यदि महाशक्तियाँ अपने बेलगाम खर्चों और भू-राजनीतिक संघर्षों पर लगाम नहीं लगाती हैं, तो आने वाले समय में दुनिया एक भीषण वैश्विक आर्थिक महामंदी की चपेट में आ सकती है।
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