आज सेंट पीटर्सबर्ग और मास्को के कूटनीतिक गलियारों से एक बेहद सनसनीखेज और बड़ी खबर सामने आ रही है, जिसने दुनिया भर के रक्षा विश्लेषकों को चौंका दिया है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने आधिकारिक रूप से यह सहमति जता दी है कि वह संयुक्त राज्य अमेरिका और यूक्रेन के साथ मिलकर आगामी महीने में एक उच्चस्तरीय 'त्रिपक्षीय शांति वार्ता' (Trilateral Peace Talks) में शामिल होंगे। अमेरिकी दूतों की रूस यात्रा के बाद यह बड़ा कूटनीतिक मोड़ आया है।
अंतर्राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी प्रशासन के विशेष दूत और रूसी नेतृत्व के बीच हुई लंबी गुप्त बैठकों के बाद इस बात के संकेत मिले हैं कि लंबे समय से चले आ रहे इस विध्वंसक युद्ध को रोकने के लिए अब कूटनीतिक रास्ते तलाशे जा रहे हैं। हालांकि यूक्रेन के मोर्चों पर अभी भी संघर्ष जारी है, लेकिन इस उच्चस्तरीय तीन-पक्षीय शिखर सम्मेलन की तैयारी ने वैश्विक बाजारों में युद्ध विराम की एक नई उम्मीद जगा दी है।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह घटना भारत की उस पुरानी विदेश नीति और कूटनीतिक रुख की बहुत बड़ी जीत है, जिसमें भारत लगातार यह कहता रहा है कि युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं है और हर विवाद को केवल बातचीत तथा संवाद (Dialogue and Diplomacy) के जरिए ही सुलझाया जा सकता है। नई दिल्ली ने इस संभावित शांति पहल का स्वागत किया है।
आर्थिक मोर्चे पर, यदि इस त्रिपक्षीय वार्ता से रूस-यूक्रेन युद्ध पर विराम लगाने की कोई ठोस रूपरेखा तैयार होती है, तो वैश्विक ऊर्जा बाजारों, उर्वरक (Fertilizer) आपूर्ति और खाद्यान्न के दामों में भारी स्थिरता आएगी। भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह राहत की बात होगी, क्योंकि इससे आयातित महँगाई और घरेलू खाद्य संकट पर लगाम लगेगी।
रक्षा और कूटनीति के स्तर पर, भारत इस शांति प्रक्रिया के दौरान अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' को बनाए रखते हुए पश्चिमी देशों और रूस दोनों के साथ अपने पारंपरिक संबंधों को संतुलित कर रहा है। भारत की यह तटस्थ और स्वतंत्र नीति वैश्विक पटल पर उसकी साख को और अधिक मजबूत कर रही है।
यह विकास इस बात का प्रमाण है कि अंततः सबसे भीषण युद्धों को भी रोकने के लिए कूटनीति के मेज पर आना ही पड़ता है। दुनिया भर के निवेशकों और नीति निर्माताओं की निगाहें अब आगामी महीने में होने वाली इस ऐतिहासिक तीन-पक्षीय बैठक के परिणामों पर टिकी हुई हैं।
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