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साहित्यिक शिखर सम्मेलन में गूंजा सर्जनात्मक शंखनाद

भारतीय सांस्कृतिक और साहित्यिक गगन के क्षितिज पर आज एक ऐसा प्रदीप्त सूर्य उगा है, जिसकी किरणों ने महानगरों की चकाचौंध से कोसों दूर पड़े उन तमाम अछूते और बिसराए हुए पृष्ठों को रोशन कर दिया है, जो सदियों से उपेक्षा की धूल फांक रहे थे।

Ajay Poddar 'Anmol'
Ajay Poddar 'Anmol'
07 Nov 2026
Solar farm during sunset

 भारतीय सांस्कृतिक और साहित्यिक गगन के क्षितिज पर आज एक ऐसा प्रदीप्त सूर्य उगा है, जिसकी किरणों ने महानगरों की चकाचौंध से कोसों दूर पड़े उन तमाम अछूते और बिसराए हुए पृष्ठों को रोशन कर दिया है, जो सदियों से उपेक्षा की धूल फांक रहे थे। राष्ट्रीय राजधानी के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक गलियारों में आज से आरंभ हुए तीन दिवसीय 'अखिल भारतीय सर्जनात्मक साहित्य महाकुंभ 2026' के प्रथम दिवस ने जिस विराट वैचारिक और भावनात्मक महासागर का सृजन किया है, उसने यह सिद्ध कर दिया है कि शब्द केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि इस ब्रह्मांड के सबसे बड़े प्राण-संजीवन हैं। जब देश के कोने-कोने से पधारे मर्मज्ञों, कथाकारों, कवियों और लोक-संस्कृति के संरक्षकों ने इस पवित्र प्रांगण में कदम रखा, तो ऐसा प्रतीत हुआ मानो सदियों पुरानी परंपरा और आधुनिक युग की बेचैनी एक ही मंच पर आकर आपस में गले मिल रही हों।

यह आयोजन मात्र पुस्तकों की प्रदर्शनी या बौद्धिक चर्चाओं का मंच नहीं है, बल्कि यह उस अंतहीन मानवीय चेतना का पुनर्पाठ है जो कंक्रीट के जंगलों और मशीनी जीवनशैली के बीच कहीं दम तोड़ती जा रही थी। पहले दिन के उद्घाटन सत्र की शुरुआत ही एक अनोखी और गहरे दार्शनिक गूंज के साथ हुई। जब मुख्य सभागार के प्रदीप्त मंच पर देश के वरिष्ठतम कथाकारों ने एक साथ दीप प्रज्वलित किया, तो वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति की आँखों में एक अजीब सी तृप्ति और भविष्य के उपन्यासों को लेकर एक नई जिज्ञासा चमक उठी। मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए देश के एक प्रख्यात समालोचक ने अपनी बात रखते हुए अत्यंत मार्मिक अंदाज में कहा कि, "साहित्य किसी भी जीवित समाज की अंतरात्मा का वह एक्सरे है, जो उसकी अंदरूनी टूट-फूट और दर्द को बिना किसी लाग-लपेट के दुनिया के सामने रख देता है। जब-जब दुनिया अधिक मशीनी और हृदयहीन होने लगती है, तब-तब शब्द ही इंसानियत को उसका खोया हुआ मानवीय चेहरा वापस लौटाने का एकमात्र पवित्र अनुष्ठान बनते हैं।"

इस उद्घाटन सत्र में पारंपरिक लोक कथाओं, मौखिक परंपराओं और आज के डिजिटल युग में रचे जा रहे उपन्यासों के बीच एक अत्यंत रोचक और अनूठा संवाद देखने को मिला। वक्ताओं ने इस बात पर गहन मंथन किया कि कैसे आज का युवा लेखक अपनी जड़ों की माटी से जुड़ा रहकर भी वैश्विक पटल की आधुनिक अनुगूंज को अपनी कृतियों में पूरी शिद्दत से पिरो रहा है। सभागार में आगे की पंक्तियों में बैठे युवा रचनाकारों की चमकती आँखें यह चीख-चीख कर कह रही थीं कि आने वाला कल केवल उपभोग की अंधी संस्कृति का नहीं, बल्कि गहन चिंतन, संवेदना और काव्यात्मक पुनर्जागरण का होने वाला है। मंचीय चर्चाओं के दौरान उठी हर एक वैचारिक चिनगारी ने वहाँ बैठे साहित्य-प्रेमियों के भीतर शब्दों के प्रति एक नई आराधना और समर्पण का भाव जगा दिया।

जैसे-जैसे दिन अपनी दोपहर की ड्योढ़ी पार कर सांध्य बेला की ओर अग्रसर हुआ, इस महाकुंभ का मिजाज और अधिक सम्मोहक, रूमानी और लोक-गंध से भर गया। इस भव्य समागम का सबसे अधिक हृदयस्पर्शी और प्राणवान पहलू वह 'लोक-मंच' रहा, जहाँ देश के सुदूर अंचलों—छत्तीसगढ़ के घने बस्तर के वनों, राजस्थान के तपते धोरों, झारखंड की लाल मिट्टी और पूर्वोत्तर की नीली-रहस्यमयी पहाड़ियों से आए लोक-कलाकारों और युवा रचनाकारों ने अपनी मातृभाषा की सोंधी खुशबू बिखेरी। जब एक युवा आदिवासी कवि ने अपनी मूल बोली में जंगल के कटने, नदियों के सूखने और आदिवासियों के विस्थापन का मर्मस्पर्शी दर्द अपनी कविता के माध्यम से गाया, तो पूरा सभागार कुछ पलों के लिए पूरी तरह स्तब्ध और निशब्द हो गया। वह स्वर केवल एक कविता का पाठ नहीं था, बल्कि वह सदियों से सताए गए उस समाज की चीख थी, जिसे अक्सर विकास के शोर में दबा दिया जाता है। यह इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण था कि भारतीय भाषाएं केवल व्याकरण के नियम नहीं, बल्कि हमारी प्राण-संस्कृति के जीवंत और अमूल्य दस्तावेज हैं।

इस दौरान आयोजित 'भाषाओं का अंतर्संबंध और अनुवाद की महागाथा' विषयक सत्र में वक्ताओं ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि एक आंचलिक भाषा की खुशबू जब अनुवाद के सेतु से गुजरकर दूसरी भाषा के शब्दों में उतरती है, तो वह किसी एक क्षेत्र की धरोहर न रहकर पूरी मानवता की साझा थाती बन जाती है। अनुवादकों को 'सांस्कृतिक दूत' की संज्ञा देते हुए इस बात का सामूहिक संकल्प लिया गया कि भारतीय भाषाओं की श्रेष्ठ रचनाओं का आदान-प्रदान अब और अधिक तीव्र और व्यापक गति से किया जाएगा ताकि दक्षिण के छोर से लेकर उत्तर के हिमालयी शिखरों तक संवेदनाओं का एक ऐसा साझा महासागर बन सके, जिसमें दूरियों और क्षेत्रीयता की सारी दीवारें हमेशा के लिए ढह जाएं। प्रांगण में सजी पुस्तकों की दीर्घाओं और स्टॉल्स पर उन दुर्लभ कलाकृतियों, हस्तलिखित पत्रिकाओं और क्लासिक उपन्यासों को देखने के लिए पाठकों, विशेषकर युवाओं की जो भारी भीड़ उमड़ी, उसने इस प्रचलित झूठ को पूरी तरह खारिज कर दिया कि आज का युवा पढ़ना छोड़ चुका है। उस भीड़ ने यह सिद्ध कर दिया कि डिजिटल युग की नीली स्क्रीनें चाहे जितनी भी रोशनी बिखेर लें, लेकिन पन्नों की वह पारंपरिक सोंधी खुशबू, कागज़ का स्पर्श और स्याही का रहस्यमयी जादू आज भी इंसानी मन को सबसे गहरा और स्थाई सुकून देता है।

जैसे-जैसे रात अपनी चादर तानने लगी, इस साहित्यिक कुंभ का माहौल और अधिक काव्यात्मक, अंतरंग और रूमानी होता चला गया। शाम के अंतिम सत्र में आयोजित 'युवा हस्ताक्षर' और 'नयी कविता का नया मुहावरा' ने महफिल में एक ऐसा जादुई सम्मोहन पैदा किया कि श्रोता अपनी कुर्सियों से हिलने का नाम ही नहीं ले रहे थे। देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और कस्बों से चुनकर आए सौ से अधिक युवा कवियों ने जब मंच पर आकर अपनी ताजतरीन और विद्रोही रचनाओं का पाठ किया, तो पूरा वातावरण तालियों की गड़गड़ाहट और 'वाह-वाह' की गूंज से सराबोर हो गया। प्रेम के कोमल अहसास, महानगरों की घुटनभरी तन्हाई, अकेलेपन का संताप, प्रकृति के अंधाधुंध क्षरण और टूटते हुए मानवीय रिश्तों की ऊष्मा—इन तमाम समकालीन विषयों पर रची गई कविताओं ने यह बता दिया कि आज की युवा पीढ़ी के पास संवेदनाओं और अंतर्दृष्टि की कोई कमी नहीं है, उन्हें बस एक सही मंच और सुनने वाले संवेदनशील कान चाहिए।

विशेष रूप से, युवा कवयित्री अनामिका के स्वरों में जब पितृसत्तात्मक समाज की विसंगतियों और आधुनिक स्त्री के संघर्षों पर करारी चोट की गई, तो हॉल में मौजूद हर एक शख्स अंदर तक झकझोर गया। कविता का वह सत्र केवल मनोरंजन या वाहवाही बटोरने का साधन नहीं था, बल्कि वह समाज की सामूहिक चेतना और आत्मा पर लगे उन दागों को धोने का एक अत्यंत ईमानदार और कलात्मक प्रयास था, जिन्हें हम अक्सर अपनी भागदौड़ भरी यांत्रिक जिंदगी में सुविधा के खातिर नजरअंदाज कर देते हैं। मंच पर पढ़ी जा रही हर एक कविता मानो कागज पर उतरी हुई एक ऐसी सजीव और चलती-फिरती पेंटिंग थी, जिसे शब्दों के सबसे जीवंत रंगों से उकेरा गया था। श्रोताओं की नम आंखें और उनके थिरकते हुए मन इस बात की गवाही दे रहे थे कि कविता आज भी मनुष्य के सबसे दुखों भरे पलों में उसका सबसे भरोसेमंद साथी है।

तीन दिवसीय इस भव्य, विराट और सृजनात्मक महाकुंभ के पहले दिन का यह समापन सत्र इस गहरे और अटल संकल्प के साथ संपन्न हुआ कि साहित्य को केवल वातानुकूलित पुस्तकालयों और विश्वविद्यालयों की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहने दिया जाएगा, बल्कि इसे गाँव की धूल भरी चौपालों, महानगरों की भागदौड़ भरी सड़कों और हर उस बेसहारा व संवेदनशील हृदय तक पहुँचाया जाएगा जहाँ आज भी जीवन जीने की कोई न कोई जद्दोजहद जारी है। समापन उद्बोधन में आयोजकों ने एक बहुत ही प्रेरणादायक घोषणा करते हुए कहा कि आगामी वर्ष से देश के दूरदराज के ग्रामीण अंचलों में छिपी हुई अप्रतिम साहित्यिक प्रतिभाओं को मुख्यधारा में लाने के लिए 'ग्राम-संवेदना राष्ट्रीय छात्रवृत्ति' की शुरुआत की जाएगी, ताकि आर्थिक अभाव कभी भी किसी प्रतिभावान रचनाकार की कलम की धार को कुंद न कर सके।

जब रात के गाढ़े सन्नाटे में दिल्ली की सर्द हवाओं के बीच साहित्यकार अपने विश्राम स्थलों की ओर लौटे, तो उनके मन में एक अजीब सी तृप्ति और भविष्य के उपन्यासों, कहानियों व कविताओं के लिए अनगिनत नए किरदार और भूमियां तैर रही थीं। यह साहित्यिक महाकुंभ आज इस अकाट्य सत्य पर मुहर लगा गया है कि तकनीक चाहे जितनी भी उन्नत हो जाए, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) चाहे जितनी भी रफ्तार पकड़ ले, लेकिन जो असली आह, जो कसक, जो प्रेम, जो छटपटाहट और जो आंसुओं की वास्तविक भाषा एक साधारण इंसान ही कागज के पन्नों पर उतार सकता है, उसका कोई भी विकल्प इस ब्रह्मांड में कभी नहीं हो सकता। अक्षरों का यह पावन और अलौकिक यज्ञ अभी दो दिन और अनवरत चलेगा और आने वाले सत्रों में कई नए, चौंकाने वाले कृतियों के विमोचन व तीखे वैचारिक महासंग्राम की सुगबुगाहट अभी से पूरे साहित्यिक गगन में महसूस की जाने लगी है।

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