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व्यंग्यः रुपया.....पता चला तू क्यों गिरा

बाई गॉड की क़सम अब पता चला कि ख़ादी पिछड़ी क्यों और रुपया गिरा क्यों. सारा चक्कर बुढ़ऊ का निकला......ऐसा शख़्स जो हमेशा कई लोगों की आँख की किरकिरी बना रहा.

मनोज बिसारिया
Cult Current
23 Jan 2017
Solar farm during sunset

बाई गॉड की क़सम अब पता चला कि ख़ादी पिछड़ी क्यों और रुपया गिरा क्यों. सारा चक्कर बुढ़ऊ का निकला......ऐसा शख़्स जो हमेशा कई लोगों की आँख की किरकिरी बना रहा. पिछले दिनों एक नए फ़ोटो में एक और नए अवतार दिखाई दिए. वही पुराना चरखा....पर बंदा नया था. ग़ौर से देखा....अरे ये तो वही हैं. आख़िर गुजराती को गुजराती ने रिप्लेस कर ही दिया. ये गुजरात का ही दम है जहाँ एक-दूसरे के स्पेयर पार्टस आसानी से मिल जाते हैं वर्ना पूरे देश में ढूँढ लो, मजाल कोई पप्पू, टीपू, दिग्गी या खुजलीवाल-सा मिले. खैर.....बोलने वाले ने अपनी भड़ास निकाल ही ली कि जी.....ख़ादी पिटी क्यों और नोट गिरा क्यों.



अब कई दिन इस बात पर चर्चे होंगे. बेचारा इनका नेता भी करे तो क्या करे..... विदेशों में गाँधी की जय-जय बोलता है.....यहाँ अपने ही नाक़ में दम किए बैठे हैं. हालाँकि चतुर सुजानों ने बयान से पल्ला झाड़ लिया है.....पर क्या है कि जो ज़बान से निकले वो दूर तलक जाता है. नोटबंदी की धिक्कार क्या कम थी जो नई मुसीबत आ गई, तिस पर चुनाव का खटराग सो अलग.



वैसे अपुन को लगता है कि कुछ डिपार्टमेंट के लोग केवल बुरा सुनने के लिए ही ईजाद हुए हैं, जैसे आप किसी भी मौसम में नेताओं को गरिया सकते हैं. चूँकि मामला कॉमन जेंडर का होता है तो कोई भी नेता इसे पर्सनली नहीं लेता. आपकी भड़ास भी निकल जाती है और नेता बुरा भी नहीं मानते.



नेताओं के बाद सबसे ज्यादा ठुल्.....को कोसा जाता है. जब चाहे इन ग़रीबों को कोस लीजिए. बेचारे काम करें तो बदनाम, न करें तो बदनाम. प्रेमिका अपने प्रेमी के साथ भाग गई तो ये बदनाम....कि जी क्यों नहीं रोका. वापस लौट आए तो फिर बदनाम...कि जी प्रेमी को क्यों नहीं पकड़ा. तिस पर तुर्रा ये कि शहर की मशहूर जेबकतरी को पकड़ने के लिए भी इन्हें किसी महिला को ही बुलाना पड़ता है.....छेड़खानी का डर तो भैया इन्हें भी सताता है.



तीसरे प्रशासन वाले हैं. जितना जब जी चाहे कोस लो. इन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. एक तेज़-तर्रार मैडम के साथ बंदे ने अपनी तस्वीर खींचने की ऐसी जुर्रत दिखाई कि मैडम ने उसे दिन में तारे दिखा दिए. एक गिड़गिड़ाते पत्रकार ने जब मामले को जानना चाहा तो मैडम ने कहा- तेरी बहन छेड़ने को किसी को भिजवाऊँ क्या..... अब पत्रकार महोदय कहाँ हैं नहीं मालूम पर मैडम अपनी गद्दी पर क़ायम हैं. सो आप जितना हो-हल्ला मचाएं प्रशासन वालों पर कोई असर नहीं होता क्योंकि बेचारों के कान ही नहीं होते जो कोई जूँ रेंगे.



रहे गाँधी....एक अभिशप्त नायक....कभी इनकी हत्या करने वाले का महिमा-मंडन होता है, कभी दुष्ट की मौत पर जो ¢वध¢ जैसा शब्द प्रयोग में आता है.....वह इस्तेमाल होता है. बेशक वक़्त की नब्ज़ पकड़ने में गाँधी फ़ेल हो गए हों पर ये शायद उस ज़माने की आदर्शवादिता ही थी जिसमें दुश्मन के भी ह्रदय-परिवर्तन की बाट जोही जाती थी. इतिहास अज्ञ, अल्पज्ञ, नौसिखियों से भरा पड़ा है तुममें हिम्मत हो तो उनकी ग़लतियों को सुधार दो......कौन रोक रहा है. मर्द बनो....किसी व्यक्ति-विशेष को कोस कर भांड जैसे उपक्रम मत करो. सुना है भांड भी आजकल पॉलिटिकल अप्रोच रखते हैं.