चार साल बीत गये उस लोमहर्षक घटना के जिसमें न केवल दिल्ली बल्कि पूरे देश को झकझोर दिया था. 16 दिसंबर, 2012 की उस रात को अब भी लोग नहीं भूले हैं, जिसमें कुछ हैवानों की शिकार निर्भया हुई थी. इसके बाद से ही महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बड़े-बड़े दावे किये गये, सुरक्षा इंतजाम को पुख्ता करने के लिए तात्कालीन यूपीए सरकार ने तो बजट में निर्भया कोष का प्रावधान किया और वर्तमान सरकार भी इस योजना को संचालित कर रही है. लेकिन हालात है कि इसका एक बड़ा हिस्सा खर्च ही नहीं किया जा सका. स्वयं को पिछली सभी सरकारों से अलग बताने वाली मोदी सरकार भी इस मामले में कुछ अलग नहीं है.
16 दिसंबर 2012 में दिल्ली की एक चलती बस में हैवानियत की शिकार हुई निर्भया की मौत ने देश को हिला कर रख दिया था. इसके बाद उपजे आक्रोश से निपटने के लिए तत्कालीन यूपीए सरकार ने कई घोषणाएं की थी. महिला सुरक्षा से जुड़ी तमाम योजनाओं के लिए धन मुहैया कराने ‘निर्भया कोष' की स्थापना भी उनमे से एक थी. इस घोषणा को आगे बढ़ाते हुए ‘निर्भया कोष' में हर साल 1000 करोड़ रुपये दिया जा रहा है. लेकिन इसका एक बड़ा हिस्सा खर्च ही नहीं हो पा रहा है.
संसद में पेश किए गए 2015-16 के बजट में सरकार ने दो योजनाएं बनाई थीं जिनके लिए बजट का प्रावधान ‘निर्भया कोष' से किया गया था. 'पल्बिक रोड ट्रांसपॉर्ट में महिलाओं की सुरक्षा' योजना के तहत 653 करोड़ रुपये और निर्भया प्रॉजेक्ट के लिए 79.6 करोड़ रुपये. इनमे से कोई भी योजना शुरू ही नहीं हो पायी. इस कोष के जरिये महिला सुरक्षा के क्षेत्र में काम करने वाली एनजीओ को सहायता किया जाना था. सरकार इसके लिए कोई एनजीओ भी नहीं ढूंढ पायी.