एक देश एक चुनाव के समर्थन में दिये जाने वाले अधिकतर सरकारी तर्क झूठ पर चमकीले सच की परत जैसे हैं ..
एक देश एक चुनाव बेहद महत्वाकांक्षी योजना है पर सरकार द्वारा अब तक किए गए हर प्रयास की तरह इस पर भी ठोस होमवर्क नहीं किया गया लगता है. 1952, 1957, 1962, 1967 में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ ही हुए थे इसलिए एक साथ चुनाव का विचार क्रांतिकारी विचार और सबसे बड़ा चुनाव सुधार किस तरह हुआ पता नहीं. इन तीनों चुनावों के दौरान जो डेढ दशक बीते उसमें क्या राजनीतिक घमासान कम रहा और वह दौर विकास का स्वर्णिक कालखंड हो गया ऐसा भी नहीं. एक साथ चुनाव कराने से न तो धांधली रहित निष्पक्ष चुनाव संभव हो सका न ही विकास दर आसमान चढा. भाजपा की यह चाहत बरसों पुरानी है, एक दशक पहले भी उसने इरादे जाहिर किये थे. वह जब भी सत्ता के करीब होती है वह यह पत्ता खेलने की कोशिश करती है.
पार्टी ने 2014 के चुनावी घोषणापत्र में यह वादा किया था. इस पर काम भी तुरंत शुरू कर दिया. सरकार बनने के सात माह बाद ही जनवरी 2015 में कार्मिक, जनपरिवेदना, कानून और न्याय पर बनी संसदीय स्थायी समिति ने एक साथ चुनाव की व्यावहारिकता पर सरकार की सोच के समर्थन में अपनी दलीलें पेश कर दी थीं. इसी साल के खत्म होने तक चुनाव आयोग को इस विचार की बावत एक रिपोर्ट पेश कर दी थी. साल बीतते ही 2016 में विधि मंत्रालय ने संसदीय समिति की रिपोर्ट पर चुनाव आयोग से राय मांग ली. इस बीच हुआ यह कि उस समय के चुनाव आयुक्त हरि शंकर ब्रह्मा ने इस बात का खुलासा कर दिया कि 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के अलावा समूचे देश के लिये लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराये जाने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घनघोर रुचि है. प्रधानमंत्री के तत्कालीन सचिव नृपेंद्र मिश्रा ने उनको बताया कि वे एक साथ चुनाव के प्रति पीएम का जबरदस्त लगाव है.
प्रधानमंत्री की चाहत पूरी करने के लिये चुनाव आयोग ने भी लगातार कवायदें जारी रखीं. इस साल मार्च में मोदी ने एक साथ चुनाव के इरादे को पार्टी में बड़ी मजबूती से रखा. चुनाव आयोग ने भी कह दिया कि वह सितंबर तक देश में एक साथ चुनाव कराने के लिये तैयार हो जायेगा. हालांकि उसके तैयार हो जाने के बावजूद देश में संविधान में परिवर्तन और दो तिहाई राज्य सरकारों तथा विपक्षी दलों की सहमति न मिलने से एक साथ चुनाव कराने संभव न होते पर अब जब चुनाव आयोग ने भी लगभग हार मान लिया है और चुनावी साल में उसने सरकार से ठीक उतने ही पैसों की मांग कर दी है जितने का दावा एक साथ चुनाव करवाने पर बचत होने की बात सरकार कर रही थी तो ऐसे में एक देश एक चुनाव का मामला कम से कम 2019 तक ठंड़े बस्ते में ही समझा जाना चाहिये था. लेकिन सरकार रट लगाये हुये है, उसका रुख कुछ अलग है वह लगातार इस मुद्दे को गरमाये रखना चाहती है. पर आखिर क्यों? बिना किसी बड़े लक्ष्य या लाभ के यह अनथक कोशिश किसलिये? क्या महज राष्ट्रसेवा के लिये यह उद्दात भावना है.शायद नहीं इसके पीछे सिर्फ और सिर्फ सियासत है.
भाजपा का यह मानना है कि सत्ताधारी पार्टी हमेशा चुनावी मोड में रहे तो बेहतर सरकार कैसे चला पायेगी, सो सभी चुनाव पांच साल बाद हों और एक साथ हों इसी में देश समाज सबका भला है. हालांकि इतिहास बताता है कि चुनाव जीतने की चिंता से ग्रस्त नेताओं ने उतने बुरे काम नहीं किये हैं, जितने इस दबाव से मुक्त नेताओं ने. हालांकि बार बार और सालों भर चुनाव चलते रहने वाले चुनावों के बदले एक साथ ही चुनाव करवाने के पक्ष में कुछ तर्क तो वाकई ठोस लगते हैं. लेकिन व्यावहारिकता के धरातल पर कसें तो वे हवा हो जाते हैं. कई मामलों में तो लगता है कि बार चुनाव होने में ही, जनता, लोकतंत्र , बाजार, राजनीति और देश की भलाई है. सरकारी तर्क गहराई से देखें तो ओछे लगते हैं लेकिन सरकार पूरी शिद्दत से एक देश एक चुनाव अभियान के पीछे जी जान से पड़ी है. सच तो यह है कि सियासी नजरिये से देखें तो सरकार अगर इसको लागू कराने में सफल हो जाये तो यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गेमचेंजर मास्टरस्ट्रोक होगा.
पर क्या एक साथ चुनाव कराना ही देश की राजनीतिक और प्रशासनिक समस्याओं का रामबाण इलाज है? क्या इसके बाद राजनीतिक दल चुनावी फंड में काला सफेद करने से बाज आ जायेंगे. चंदे में पारदर्शिता रहेगी, वे सियासी साजिश और चुनावी गड़बड़ियां नहीं करेंगे,राजनीति जनोन्मुख हो जायेगी विपक्षी पार्टियां पांच साल शांति से बैठी रहेंगी. क्या बीच में ही भंग विधानसभाओं में मध्यावधि चुनाव संभव न होने की दशा में वहां बस बचे हुए कार्यकाल के लिए ही चुनाव होगा. मतलब बार बार का चुनाव का चक्र खत्म नहीं होगा. क्या अगले आम चुनाव तक इंतजार किया जाएगा? इससे लोकतांत्रिक विसंगति नहीं उत्पन्न होगी. क्या बिना चुनावी प्रक्रिया में व्यापक सुधार और राजनीति को सुधारे, निर्मल बनाये बिना महज एक साथ चुनाव कराने से ही लोकतंत्र मजबूत हो जाएगा, विकास की बाढ आ जयेगी. क्या इससे यह सुनिश्चित हो जाएगा कि अब किसी भी राज्य में मध्यावधि चुनाव नहीं होगा? क्या यह एक सामान्य हो चुकी बीमारी के लिये ऐसी दवा खाना नहीं होगा जिसके पार्श्व प्रभाव उससे भी घातक हैं. दिल्ली के सामाजिक कार्यकर्ता अशोक झा गंभीर समाचार से कहते हैं, “अगर एक साथ चुनाव कराने से कुछ हासिल होना होता तो शुरुआती डेढ दशक ही काफी थे यह जांचने के लिये. दशकों से ओड़िशा का चुनाव लोकसभा का साथ हो रहा है, आंध्र प्रदेश में भी बहुधा विधान सभा और लोकसभा चुनाव साथ होते रहे हैं पर क्या बदला. ये सारे सरकारी तर्क झूठ पर चमकीले सच की परत चढाने जैसा है. तर्कों के आधार पर एक साथ चुनाव को सिद्धांतत: न्यायसंगत ठहराया जा सकता है पर व्यावहारिकता और इतिहास की कसौटी पर यह विचार बोगस है. “सामाजिक अनुसंधान को समर्पित थिंक टैंक सीएसडीएस ने 1989 से 2014 के बीच लोकसभा और विधानसभा के लिये साथ मतदान करने वाले 31राज्यों में हुये चुनावों का अध्ययन करके जो नतीजा निकाला वह भी एक देश एक चुनाव की वकालत नहीं करता और लोकतंत्र की विविधता समाप्त कर एकरसता बढाने का काम करता लगता है.
स्रोतः गंभीर समाचार