Flash Cult Current
विदेश

आवरण कथाः नव-उपनिवेशवाद 2.0

डावोस की बर्फ़ीली पहाड़ियों में इस बार वैश्विक सहयोग नहीं, बल्कि शक्ति की नंगी परेड हो रही है। नियमों, संस्थाओं और नैतिकता की बातें अब केवल सजावटी आवरण हैं—असल खेल दबाव, दहशत और संसाधनों पर कब्ज़े का है। अमेरिका–यूरोप की दरारें, ग्रीनलैंड पर उभरता सैन्य लोभ, एल्गोरिदम के सहारे चलता डिजिटल साम्राज्यवाद और ग्लोबल साउथ की उबलती असहजता यह साफ़ कर देती है कि दुनिया किसी संक्रमण में नहीं, बल्कि एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है—नव-उपनिवेशवाद 2.0, जहां झंडे नहीं गाड़े जाते, भविष्य गिरवी रखे जाते हैं।

श्रीराजेश
Cult Current
02 Feb 2026
Solar farm during sunset

डावोस की बर्फ़ीली पहाड़ियों में इस बार वैश्विक सहयोग नहीं, बल्कि शक्ति की नंगी परेड हो रही है। नियमों, संस्थाओं और नैतिकता की बातें अब केवल सजावटी आवरण हैं—असल खेल दबाव, दहशत और संसाधनों पर कब्ज़े का है। अमेरिका–यूरोप की दरारें, ग्रीनलैंड पर उभरता सैन्य लोभ, एल्गोरिदम के सहारे चलता डिजिटल साम्राज्यवाद और ग्लोबल साउथ की उबलती असहजता यह साफ़ कर देती है कि दुनिया किसी संक्रमण में नहीं, बल्कि एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है—नव-उपनिवेशवाद 2.0, जहां झंडे नहीं गाड़े जाते, भविष्य गिरवी रखे जाते हैं।



डावोस की बर्फ़ीली पहाड़ियों में हर साल दुनिया के ताक़तवर लोग 'वैश्विक सहयोग' की भाषा बोलते हैं, लेकिन इस बार उस भाषा के पीछे छिपी नग्न शक्ति साफ़ दिखाई दी। मंच पर शांति, नियम और साझेदारी की बातें थीं, जबकि समानांतर रूप से दुनिया को यह संदेश भी दिया जा रहा था कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति फिर से ताक़त के व्याकरण में लौट रही है। यही वह क्षण था जब डावोस का मुखौटा उतरा—और यह स्वीकारोक्ति सामने आई कि दुनिया नियमों से नहीं, बल्कि डर और दबाव से चलाई जा रही है।

इसी मंच पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का ग्रीनलैंड को लेकर दिया गया बयान इस बदलती विश्व-मानसिकता का सबसे सटीक प्रतीक बन गया। औपचारिक रूप से उन्होंने कहा कि वे 'कोई सैन्य बल इस्तेमाल नहीं करेंगे' और न ही यूरोप पर टैरिफ लगाएंगे, लेकिन उसी सांस में उन्होंने अमेरिकी बमवर्षकों, मिसाइल क्षमताओं और आर्कटिक में अमेरिकी सैन्य वर्चस्व की चर्चा कर दी। यह कोई कूटनीतिक असावधानी नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित प्रदर्शन था—एक ऐसा शक्ति-प्रदर्शन, जो शब्दों में नहीं, संकेतों में धमकी देता है। डेनमार्क और पूरे यूरोप के लिए संदेश स्पष्ट था: सहमति न भी हो, तो अमेरिका के पास विकल्प मौजूद हैं।

यह वही मानसिकता है जिसने कभी औपनिवेशिक युग को जन्म दिया था। फर्क सिर्फ़ इतना है कि आज उपनिवेश झंडों और सेनाओं से नहीं, बल्कि रणनीतिक भूभाग, संसाधनों, टेक्नोलॉजी और सैन्य संकेतों के ज़रिये तय किए जा रहे हैं। ग्रीनलैंड पर ट्रंप की ज़िद दरअसल बर्फ़ की ज़मीन से अधिक उस सोच का विस्तार है, जिसमें भूगोल फिर से भाग्य लिखने लगा है और ताक़त, नैतिकता पर भारी पड़ रही है। डावोस में दिया गया यह बयान केवल ग्रीनलैंड के लिए नहीं था—यह पूरे यूरोप को उसकी रणनीतिक निर्भरता का आईना दिखाने जैसा था। 

विडंबना देखिए कि वर्ष 1945 के बाद, जब हिरोशिमा और नागासाकी की राख से मानवता ने सबक लेने का दावा किया था, तब वाशिंगटन और लंदन ने एक ऐसी दुनिया का सपना गढ़ा था जहाँ राष्ट्रों का आचरण 'पाशविक शक्ति' से नहीं, बल्कि संस्थाओं और कानूनों से संचालित होगा। संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और बाद में विश्व व्यापार संगठन—ये सभी उसी उदारवादी अंतरराष्ट्रीयवाद के स्तंभ थे। वादा किया गया था कि अब ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ नहीं चलेगी, बल्कि नियम-आधारित विश्व व्यवस्था होगी। लेकिन डावोस 2026 में यह भ्रम पूरी तरह टूटता दिखा।

वर्ष 2025–26 की दहलीज पर खड़ी दुनिया अब एक नितांत भिन्न, अधिक क्रूर और अस्थिर यथार्थ में प्रवेश कर चुकी है। इस यथार्थ का सबसे सजीव दृश्य स्विट्ज़रलैंड के डावोस में दिखाई देता है, जहाँ वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मंच से सतत विकास और समावेशी वृद्धि की बातें तो होती हैं, लेकिन वास्तविक चिंता रणनीतिक नियंत्रण, आपूर्ति शृंखलाओं की सुरक्षा और प्रभाव क्षेत्रों को लेकर है। बाहर आलप्स की बर्फ़ जमा देने वाली है, और भीतर कूटनीतिक रिश्तों में जमी बर्फ़ उससे कहीं ज़्यादा ठंडी और खतरनाक।

डावोस, जिसे कभी वैश्वीकरण और मुक्त व्यापार का मक्का कहा जाता था, आज अपने ही अस्तित्वगत संकट से जूझ रहा है। मंच पर 'वैश्विक सहयोग' के नारे हैं, लेकिन बंद कमरों में शक्ति-संतुलन, प्रतिशोध और गुटबंदी की भाषा बोली जा रही है। शैंपेन के गिलासों की खनक के बीच एक बेचैन सन्नाटा पसरा है। ट्रंप का ग्रीनलैंड पर दिया गया बयान इस सन्नाटे को चीरता हुआ यह याद दिलाता है कि आज की दुनिया में नियमों की दुहाई वही दे रहे हैं जिनकी शक्ति क्षीण हो रही है, जबकि प्रभुत्वशाली ताक़तें नियमों को केवल सुविधा अनुसार इस्तेमाल कर रही हैं।

आज डावोस किसी बेहतर भविष्य का उत्सव नहीं, बल्कि एक टूटती हुई वैश्विक व्यवस्था का शोकगीत बन चुका है—जहाँ मुस्कुराते चेहरों के पीछे छिपा डर यह कह रहा है कि दुनिया एक बार फिर उसी मोड़ पर खड़ी है, जहाँ ताक़त ही अंतिम तर्क हुआ करती है।

डोनाल्ड ट्रंप का दोबारा अमेरिकी राष्ट्रपति बनना और उनका आक्रामक, बिना लाग-लपेट वाला कार्यकाल, इस प्रक्रिया का कोई आकस्मिक परिणाम नहीं है। यह उस गहरे संरचनात्मक क्षरण का प्रतीक है जिसे विद्वान दशकों से 'पश्चिमी प्रभुत्व का अंत' और 'इतिहास की वापसी' कह रहे हैं। ट्रंप की 'अमेरिका प्रथम' नीति ने कूटनीति के उन रेशमी धागों को एक ही झटके में तोड़ दिया है, जिन्होंने दशकों से दुनिया को बांध रखा था। इसके स्थान पर 'लेन-देन आधारित अराजकता' का जन्म हुआ है। यह अराजकता केवल राजनीतिक अस्थिरता नहीं है; यह एक नए प्रकार के 'नव-उपनिवेशवाद 2.0' की प्रस्तावना है। जहां 19वीं सदी का उपनिवेशवाद भौगोलिक सीमाओं को रौंदता था, तोपों और जहाजों से संचालित होता था, वहीं 21वीं सदी का यह नया संस्करण 'डेटा', 'आपूर्ति शृंखला', 'तकनीकी एकाधिकार' और 'बर्फीले महाद्वीपों' के माध्यम से राष्ट्रों की संप्रभुता का गला घोंट रहा है।

उदारवादी व्यवस्था का भ्रम, पाखंड और पतन

नियम-आधारित व्यवस्था का पतन समझने के लिए इसके उत्थान की पृष्ठभूमि और इसके अंतर्निहित विरोधाभासों को समझना आवश्यक है। शीत युद्ध के दौरान, अमेरिका ने एक 'उदारवादी वर्चस्व' का निर्माण किया। इसका तर्क सरल और मोहक था—यदि दुनिया के देश आपस में व्यापार करेंगे, एक-दूसरे के बाजारों पर निर्भर रहेंगे और एक साझा कानूनी ढांचे से बंधे होंगे, तो युद्ध की संभावना क्षीण हो जाएगी। यह 'लोकतांत्रिक शांति सिद्धांत' का व्यावहारिक अनुप्रयोग था, जिसने यह माना कि व्यापार करने वाले देश एक-दूसरे से लड़ते नहीं हैं।

हालांकि, यह व्यवस्था कभी भी उतनी 'समानतावादी' या 'न्यायपूर्ण' नहीं थी जितनी कि यह कागजों पर सुनहरी स्याही से लिखी गई थी। इसमें 'नियम' सबके लिए थे, लेकिन 'अपवाद' केवल अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के लिए सुरक्षित थे। 2003 का इराक युद्ध, जहां झूठे सबूतों के आधार पर एक संप्रभु राष्ट्र को नष्ट कर दिया गया, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के प्रति अमेरिका का उपेक्षापूर्ण रवैया, और चयनात्मक मानवाधिकार हस्तक्षेपों ने इस व्यवस्था की नैतिक नींव को काफी पहले ही दीमक की तरह खोखला कर दिया था। शेष विश्व, जिसे अब हम 'ग्लोबल साउथ' कहते हैं, उसने यह महसूस करना शुरू कर दिया कि ये नियम दरअसल पश्चिमी वर्चस्व को शाश्वत बनाए रखने के चतुर उपकरण मात्र हैं।

1990 के दशक में वैश्वीकरण को एक 'परोपकारी शक्ति' के रूप में पेश किया गया। यह कहा गया कि 'उठती हुई लहरें सभी नावों को ऊपर उठाती हैं।' लेकिन 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट ने यह सिद्ध कर दिया कि आर्थिक परस्पर निर्भरता एक दोधारी तलवार है। जब पश्चिमी बैंक डूबे, तो उसकी सजा पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं ने भुगती। जब व्यापारिक नियमों का उपयोग विकासशील देशों की नीतिगत स्वायत्तता को छीनने के लिए किया जाने लगा, तो 'नियम-आधारित व्यवस्था' के प्रति मोहभंग होना स्वाभाविक था। आज व्यापारिक संधियां 'विकास' का साधन कम और 'नियंत्रण' का औजार अधिक बन गई हैं। डावोस में आज जो अविश्वास दिख रहा है, वह इसी ऐतिहासिक धोखे का परिणाम है।

ट्रंपवाद और 'वैश्विक सहमति' का विध्वंस

यदि नियम आधारित विश्व व्यवस्था एक जर्जर इमारत थी, जिसकी दीवारों में दरारें पड़ चुकी थीं, तो डोनाल्ड ट्रंप वह बुलडोजर हैं जिसने इसकी नींव हिला दी है। ट्रंप की वैश्विक दृष्टि 'यथार्थवाद' के उस क्रूर संस्करण पर आधारित है जहां कोई स्थायी मित्र नहीं होता, केवल स्थायी हित होते हैं। उनकी नीतियों ने दुनिया को यह कड़वा सच याद दिला दिया है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति 'प्रेम पत्र' लिखने की कला नहीं, बल्कि 'शक्ति प्रदर्शन' का अखाड़ा है।

ट्रंप ने नाटो जैसे पवित्र माने जाने वाले सुरक्षा गठबंधनों को एक 'व्यापारिक सौदे' की तरह पेश किया है। उनके लिए यूरोप या जापान की सुरक्षा अमेरिका का नैतिक उत्तरदायित्व नहीं, बल्कि एक 'सेवा' है जिसके लिए उन्हें भुगतान करना चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे किसी सुरक्षा एजेंसी को पैसा दिया जाता है। यह नजरिया अंतरराष्ट्रीय संबंधों को 'संस्थागत सहयोग' के उच्च आसन से गिराकर 'भाड़े की सुरक्षा' के स्तर पर ले आता है। जब दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति अपने गठबंधनों को 'सब्सिडी' और 'बोझ' कहने लगे, तो वैश्विक शक्ति संतुलन का चरमराना निश्चित है।

पेरिस जलवायु समझौते से बाहर निकलना, ईरान परमाणु सौदे को एकतरफा तोड़ना और विश्व व्यापार संगठन के अपीलीय निकाय को पंगु बनाना—ये ट्रंप के वे कदम हैं जिन्होंने यह स्पष्ट संदेश दिया कि अमेरिका अब उन नियमों को नहीं मानेगा जिन्हें उसने खुद बनाया था। यह 'अराजक विश्व व्यवस्था' की शुरुआत है। यह एक ऐसी दुनिया है जहां 'बहुपक्षवाद' मर चुका है और 'द्विपक्षीय दादागिरी' का बोलबाला है। जब 'अधिनायक' ही नियमों को तोड़ने लगे, तो दुनिया 'मत्स्यन्याय' यानी जंगल के कानून की ओर लौटने लगती है, जहां केवल वही सुरक्षित है जिसके पास नुकीले दांत और मजबूत जबड़े हैं। ट्रंप का संदेश स्पष्ट है: 'हम नियम नहीं बनाएंगे, हम परिणाम तय करेंगे।'

अटलांटिक में दरारें और यूरोप का अस्तित्वगत संकट

इस अराजकता का सबसे गहरा, सबसे वेदनापूर्ण प्रभाव अटलांटिक महासागर के दोनों किनारों पर महसूस किया जा रहा है। अमेरिका और यूरोप के बीच की वह साझेदारी, जिसे कभी 'पश्चिमी सभ्यता का आधारस्तंभ' और लोकतंत्र का प्रहरी माना जाता था, आज अविश्वास के गहरे समुद्र में डूब रही है।

डावोस के गलियारों में यूरोपीय राजनयिकों के चेहरों पर एक अजीब सी बेचैनी और हताशा पढ़ी जा सकती है। दशकों तक यूरोप अमेरिका की सुरक्षा छतरी के नीचे निश्चिंत होकर सोता रहा, अपनी सेनाओं को छोटा करता रहा, अपनी अर्थव्यवस्था को बढ़ाता रहा और अपने नागरिकों को 'कल्याणकारी राज्य' का आनंद देता रहा। लेकिन अब ट्रंप के अमेरिका ने उस छतरी को हटा लेने की धमकी दे दी है। यूरोप को यह कठोर संदेश दिया जा रहा है कि उसे अपनी सुरक्षा का खर्च खुद उठाना होगा। यह यूरोप के लिए केवल आर्थिक झटका नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक आघात है, जिसने उसकी पूरी पहचान को संकट में डाल दिया है।

यूरोप को लगता है कि यूक्रेन युद्ध और रूस विरोधी प्रतिबंधों का सबसे भारी आर्थिक बोझ उसने उठाया है। उसकी सस्ती ऊर्जा की आपूर्ति बंद हो गई, उसके उद्योग बंद हो रहे हैं, और महंगाई आसमान छू रही है। दूसरी ओर, अमेरिका अपनी ऊर्जा (एलएनजी) और हथियारों को ऊंचे दामों पर बेचकर मुनाफा कमा रहा है और साथ ही 'मुद्रास्फीति न्यूनीकरण अधिनियम' के जरिए यूरोपीय उद्योगों को अमेरिका खींच रहा है। यह 'मित्रता' अब यूरोप को 'शोषण' जैसी प्रतीत होने लगी है। डावोस में अमेरिकी प्रतिनिधियों का रवैया स्पष्ट करता है कि उनके लिए यूरोप अब 'समान भागीदार' नहीं, बल्कि एक 'कनिष्ठ सहयोगी' है जिसे वाशिंगटन के आदेशों का पालन करना चाहिए, चाहे उससे उसका कितना ही नुकसान क्यों न हो।

यही कारण है कि यूरोप, अपनी तमाम हिचकिचाहट और आंतरिक मतभेदों के बावजूद, अब चीन की ओर एक उम्मीद भरी नजर से देख रहा है। यह यूरोप का वैचारिक हृदय परिवर्तन नहीं, बल्कि उसकी 'रणनीतिक विवशता' है। जर्मन उद्योगपति और फ्रांसीसी रणनीतिकार यह समझ चुके हैं कि वे अमेरिका और चीन के बीच के इस महायुद्ध में केवल 'मोहरा' नहीं बन सकते। चीन के साथ 'जोखिम न्यूनीकरण' की बात करते हुए भी यूरोप व्यापार के दरवाजे खुले रखना चाहता है। यह उसी प्रकार की स्थिति है जैसे डूबता हुआ व्यक्ति तिनके का सहारा ढूंढता है—भले ही वह तिनका उसका प्रतिद्वंद्वी ही क्यों न हो। यूरोप आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहां एक रास्ता अमेरिकी अधीनता की ओर जाता है और दूसरा अनिश्चितता के अंधेरे की ओर।

नया कुरुक्षेत्र और संसाधन राष्ट्रवाद

यदि नव-उपनिवेशवाद का एक चेहरा वाशिंगटन और ब्रुसेल्स के बीच की तनातनी है, तो उसका दूसरा और अधिक भयावह चेहरा बर्फीले उत्तर में, विशेषकर ग्रीनलैंड और आर्कटिक क्षेत्र में दिखाई दे रहा है।

इतिहास गवाह है कि साम्राज्यों की भूख कभी मिटती नहीं; वह केवल अपना भोजन बदलती है। 2019 में जब डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को 'खरीदने' का प्रस्ताव रखा था, तो वैश्विक मीडिया ने इसे एक रीयल-एस्टेट मुगल का मजाक समझकर उड़ा दिया था। लेकिन सामरिक दृष्टि रखने वालों के लिए यह एक गंभीर खतरे की घंटी थी। यह प्रस्ताव 21वीं सदी में 19वीं सदी की उस औपनिवेशिक मानसिकता की वापसी थी, जो भूगोल को राष्ट्र, संस्कृति या लोगों का घर नहीं, बल्कि केवल एक 'परिसंपत्ति' मानती है जिसका सौदा किया जा सकता है।

ग्रीनलैंड और आर्कटिक क्षेत्र आज महाशक्तियों के लिए 'भविष्य का खजाना' बन गए हैं। जलवायु परिवर्तन, जिसे दुनिया के लिए संकट माना जाता है, महाशक्तियों के लिए एक 'अवसर' बनकर उभरा है। पिघलती बर्फ ने न केवल नए समुद्री मार्ग (जो एशिया और यूरोप की दूरी कम कर देंगे) खोल दिए हैं, बल्कि बर्फ की सफेद चादर के नीचे दबे यूरेनियम, दुर्लभ खनिजों (जो चिप्स और बैटरियों के लिए अनिवार्य हैं), तेल और प्राकृतिक गैस के असीमित भंडारों को भी उजागर कर दिया है। अमेरिका और यूरोप के बीच ग्रीनलैंड को लेकर चल रही कूटनीतिक खींचतान ने यह सिद्ध कर दिया है कि 'पर्यावरण संरक्षण' के नारे अक्सर 'संसाधन नियंत्रण' की मंशा को छिपाने के लिए लगाए जाते हैं।

ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति उसे आर्कटिक का प्रहरी बनाती है। अमेरिका इसे रूस और चीन के खिलाफ अपने 'अभेद्य विमानवाहक पोत' के रूप में देखता है। वहीं, डेनमार्क और यूरोपीय संघ इसे अपनी संप्रभुता का हिस्सा मानते हैं, लेकिन उनके पास इसकी सुरक्षा करने की क्षमता सीमित है। यह खींचतान केवल एक द्वीप के लिए नहीं है; यह इस बात का निर्धारण करने के लिए है कि भविष्य की ऊर्जा और सामरिक मार्गों पर किसका नियंत्रण होगा।

आर्कटिक काउंसिल, जो कभी शांतिपूर्ण वैज्ञानिक सहयोग का मंच था, अब बिखर चुका है। रूस अपने उत्तरी तटों का आक्रामक सैन्यीकरण कर रहा है, नए अड्डे बना रहा है। चीन, जिसका आर्कटिक से कोई सीधा सीमा संपर्क नहीं है, खुद को 'निकट-आर्कटिक राज्य' घोषित कर रहा है और वहां 'पोलर सिल्क रोड' बनाने की महत्वाकांक्षा रखता है। जवाब में अमेरिका ग्रीनलैंड पर अपना प्रभाव जमा रहा है। यह 'आर्कटिक के लिए होड़' बिल्कुल वैसी ही है जैसा 19वीं सदी में अफ्रीका के लिए हुआ था—एक ऐसा 'अस्वामित क्षेत्र' जिसे ताकतवर भेड़िए आपस में बांट लेना चाहते हैं। यहां संप्रभुता का अर्थ 'ध्वज फहराना' नहीं, बल्कि संसाधनों को खोद निकालना है।

कनाडा, जो अमेरिका का पड़ोसी और सहयोगी है, इस खेल में एक मूक दर्शक और कुछ हद तक पीड़ित की भूमिका में है। उसकी स्थिति उस छोटे भाई जैसी है जो बड़े भाई की दादागिरी से असहज तो है, लेकिन विरोध करने की स्थिति में नहीं। कनाडा की यह चुप्पी और भय, डावोस की वातानुकूलित चर्चाओं के बीच, छोटे और मध्यम राष्ट्रों की विवशता का प्रतीक है, जो यह देख रहे हैं कि उनके पिछवाड़े में महाशक्तियां शतरंज की बिसात बिछा रही हैं।

डिजिटल साम्राज्यवाद

अब दृष्टि को भूगोल के नक्शे से हटाकर उस दुनिया की ओर ले चलते हैं जो अदृश्य है, लेकिन सर्वव्यापी है—डिजिटल दुनिया। आज की शब्दावली में जिसे 'तकनीकी-सामंतवाद' कहा जा रहा है, वह वास्तव में नव-उपनिवेशवाद का डिजिटल चेहरा है। यह उपनिवेशवाद का सबसे खतरनाक रूप है क्योंकि यह जमीन पर कब्जा नहीं करता, बल्कि दिमागों पर कब्जा करता है।

18वीं सदी में ईस्ट इंडिया कंपनी ने व्यापार के बहाने प्रशासनिक नियंत्रण हासिल किया था। 21वीं सदी में सिलिकॉन वैली की दिग्गज तकनीकी कंपनियां (अमेजन, गूगल, मेटा, माइक्रोसॉफ्ट) और चीन की तकनीकी दिग्गज कंपनियां—यही भूमिका निभा रही हैं। औपनिवेशिक काल में अफ्रीका और एशिया से कच्चा माल (कपास, मसाले, खनिज) लूटा जाता था और उन्हें महंगे उत्पाद बेचे जाते थे; आज 'डेटा' वह नया सोना है जिसे लूटा जा रहा है।

विकासशील देशों के नागरिकों का डेटा—उनकी पसंद, उनकी राजनीतिक विचारधारा, उनका वित्तीय व्यवहार, उनके बायोमेट्रिक्स, उनके डर और उनकी इच्छाएं—मुक्त रूप से इन वैश्विक कंपनियों द्वारा संकलित किया जाता है। इस डेटा को सुदूर कैलिफोर्निया या शंघाई में स्थित सर्वरों में 'परिष्कृत' किया जाता है। फिर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के माध्यम से इसी डेटा का उपयोग करके उन्हीं देशों के नागरिकों के व्यवहार को नियंत्रित, प्रभावित और निर्देशित किया जाता है। यह 'डेटा निष्कर्षण' की वह प्रक्रिया है जो राष्ट्रों को उनकी सबसे मूल्यवान संपत्ति—उनके नागरिकों की निजता और स्वतंत्र सोच—से वंचित कर रही है।