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विचार

फीके पड़ते महात्मा गांधी

तेज़ शहरीकरण, उपभोक्तावाद और बदलती जीवनशैली के बीच गांधी के सादगी, संयम और ग्राम स्वराज के आदर्श धीरे-धीरे पीछे छूटते दिख रहे हैं। आधुनिक भारत में मूल्य और व्यवहार के बीच की दूरी लगातार गहराती जा रही है।

रामनाथ झा
Cult Current
02 Apr 2026
Solar farm during sunset

महात्मा गांधी के आदर्श आज के भारत में धीरे-धीरे कमजोर पड़ते दिखाई दे रहे हैं। तेज़ शहरीकरण और आधुनिकीकरण ने लोगों की सोच, जीवनशैली और प्राथमिकताओं को काफी बदल दिया है। पहले जहां सादगी, आत्मनिर्भरता और नैतिक मूल्यों को अधिक महत्व दिया जाता था, वहीं आज भौतिक सुख-सुविधाओं और उपभोक्तावाद की ओर झुकाव बढ़ गया है। इसी कारण गांधीजी के नैतिक विचारों और आज की सामाजिक हकीकत के बीच दूरी बढ़ती जा रही है।

भारत को आज़ाद हुए लगभग आठ दशक हो चुके हैं। इस दौरान देश में बड़े बदलाव आए हैं। तकनीक के विकास ने दुनिया को एक-दूसरे के करीब ला दिया है। अब जानकारी कुछ ही सेकंड में एक जगह से दूसरी जगह पहुंच जाती है। लोगों का रहन-सहन, काम करने का तरीका और सोचने का नजरिया भी बदल गया है। दुनिया के कई देशों में जीवनशैली अब काफी हद तक मिलती-जुलती दिखती है, जिसे वैश्विक संस्कृति कहा जा सकता है।

इन बदलावों में शहरीकरण की बड़ी भूमिका रही है। गांवों से लोग बेहतर शिक्षा, रोजगार और सुविधाओं की तलाश में शहरों की ओर जा रहे हैं। शहर नई सोच, नए अवसर और नई जीवनशैली को बढ़ावा देते हैं। लेकिन इसी प्रक्रिया में पारंपरिक और गांधीवादी मूल्यों का प्रभाव कम होता जा रहा है।

शहर स्वभावतः सांस्कृतिक और वैचारिक संगम स्थल होते हैं। इस प्रक्रिया ने भारत और उसके नागरिकों पर गहरा प्रभाव डाला है, जिससे आज का भारतीय 1947 के भारतीय से लगभग भिन्न दिखाई देता है। इस बदलाव ने पारंपरिक और गांधीवादी आदर्शों को भी काफी हद तक क्षीण किया है। यद्यपि अधिकांश भारतीय महात्मा गांधी को उच्च सम्मान देते हैं और स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को स्वीकार करते हैं, फिर भी एक बड़ा वर्ग उनके कई मूल सिद्धांतों से दूर होता दिखाई देता है।

गांधीवादी संयम से बढ़ते मदिरा बाजार तक

गांधी शराब सेवन के कट्टर विरोधी थे और किसी भी ऐसी नीति के पक्ष में नहीं थे जो मद्यपान को बढ़ावा दे। उन्होंने इसे ‘शैतान की खोज‘ बताया। उनका मानना था कि शराब मनुष्य की आत्मा को नष्ट कर उसे पशु बना देती है। उन्होंने कहा था, ‘यदि मुझे पूरे भारत का एक घंटे के लिए तानाशाह नियुक्त किया जाए, तो मैं बिना मुआवजे सभी शराब की दुकानों को बंद कर दूँगा और सारी ताड़ी नष्ट कर दूँगा।’

फिर भी, भारत में मद्यपान का इतिहास वेदों तक जाता है। स्वतंत्रता के समय प्रति व्यक्ति शराब खपत बहुत कम मानी जाती है। सामाजिक रूप से शराब को नापसंद किया जाता था, सिवाय छोटे अभिजात और पाश्चात्य प्रभाव वाले वर्गों के। गांधी के विरोध के कारण ही भारतीय संविधान में मद्यनिषेध को राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों में शामिल किया गया। अनुच्छेद 47 में कहा गया है कि राज्य स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मादक पेय और औषधि को छोड़कर अन्य नशीले पदार्थों के सेवन पर प्रतिबंध लाने का प्रयास करेगा।

स्वतंत्रता के बाद हरियाणा, तमिलनाडु, केरल, मेघालय, मिज़ोरम, नागालैंड और मणिपुर जैसे राज्यों ने मद्यनिषेध का प्रयोग किया, परंतु सफलता नहीं मिली। काला बाजार फलता-फूलता रहा। अधिकांश राज्यों ने नीति छोड़ दी। बिहार इसका हालिया उदाहरण है। समय के साथ प्रति व्यक्ति खपत बढ़ी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार यह चार लीटर से अधिक हो चुकी है। भारतीय व्हिस्की वैश्विक खपत का लगभग 48 प्रतिशत है। लगभग 14।6 प्रतिशत वयस्क शराब पीते हैं, और महिलाओं में भी स्वीकृति बढ़ रही है। स्पष्ट है कि गांधी का संयम आह्वान सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर कमजोर पड़ रहा है।

ग्राम स्वराज बनाम शहरी परिवर्तन 

गांधी ने ग्राम स्वराज का समर्थन किया। वे गाँवों को आर्थिक और नैतिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे। उनका विश्वास था कि भारत का भविष्य गाँवों में है। वे शहरों के विस्तार के विरोधी थे। इसके विपरीत, स्वतंत्रता के बाद भारत में शहरीकरण बढ़ा है। 1951 में शहरी आबादी 17।29 प्रतिशत थी, 2011 में 31।16 प्रतिशत हुई और अब लगभग 36 प्रतिशत आंकी जाती है। ग्रामीण हिस्सेदारी 82।71 से घटकर लगभग 64 प्रतिशत रह गई है। आर्थिक वृद्धि के साथ शहरीकरण और बढ़ेगा।

लोग बड़े पैमाने पर गाँवों से शहरों की ओर गए हैं। स्वतंत्रता के समय 6 करोड़ से कम शहरी आबादी अब 50 करोड़ से अधिक हो चुकी है। लगभग 1।8 करोड़ भारतीय विदेश भी गए हैं। गाँव गणराज्य की अवधारणा धीरे-धीरे पीछे छूटती दिखती है।

खादी की परिकल्पना और उसका हाशियाकरण 

स्वतंत्रता के समय खादी-हाथ से काता और बुना हुआ वस्त्र-भारतीय चेतना में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती थी, जिसका श्रेय मुख्यतः महात्मा गांधी के प्रयासों को जाता है। गांधी ने खादी को गरीब ग्रामीणों के लिए रोजगार के साधन के रूप में देखा। समय के साथ उन्होंने इसे आत्मनिर्भरता, स्वशासन और विदेशी वस्तुओं पर निर्भरता के विरोध की एक विचारधारा का रूप दे दिया। औपनिवेशिक शासन कच्चा माल इंग्लैंड भेजकर वहीं तैयार महंगे कपड़े बनाकर भारत में पुनः आयात करता था, जिससे स्थानीय उद्योग कमजोर होते गए, उनका अपना वस्त्र उद्योग मजबूत हुआ और भारी मुनाफा अर्जित हुआ। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान खादी प्रतिरोध और देशभक्ति के प्रतीक के रूप में उभरी।

स्वतंत्रता के आरंभिक वर्षों में खादी वस्त्र सड़कों पर सामान्यतः दिखाई देते थे। अनेक राजनीतिक नेता और स्वतंत्रता सेनानी इसे धारण करते थे। 1956 में भारत सरकार ने इसके प्रोत्साहन हेतु खादी ग्रामोद्योग आयोग की स्थापना की। किन्तु तकनीकी प्रगति और बड़े पैमाने पर उत्पादन की प्रतिस्पर्धा के सामने खादी टिक नहीं सकी। इसकी उत्पादन लागत अधिक थी और वितरण संबंधी सीमाएँ भी थीं, जबकि यह आरामदायक, पर्यावरण-अनुकूल और त्वचा के लिए उपयुक्त थी। वस्त्र कंपनियों ने खादी को दरकिनार कर सस्ते और विविध परिधान बाजार में उतार दिए। ‘कम कीमत में सर्वोत्तम मूल्य’ की बाजार अवधारणा हावी हो गई। साथ ही, सरकारी नीतियाँ भी इसके व्यापक प्रसार में प्रभावी भूमिका नहीं निभा सकीं।

गांधी के कई सिद्धांत आज भी लाखों लोगों को सही-गलत का मार्ग दिखाते हैं। उनके विचार सादगी, सत्य, अहिंसा और आत्मनिर्भरता पर आधारित थे, जो आज भी नैतिक प्रेरणा देते हैं। हालांकि, स्वतंत्रता के बाद भारत ने विकास और औद्योगीकरण की राह अपनाई, जिससे तेज़ शहरीकरण और आर्थिक विस्तार हुआ। शहरों का बढ़ना, aबाज़ार आधारित अर्थव्यवस्था और उपभोक्तावाद की प्रवृत्ति ने जीवनशैली को बदल दिया। इन बदलावों के कारण नीतियों और सामाजिक प्राथमिकताओं में व्यावहारिकता बढ़ी, जबकि गांधी के ग्राम स्वराज और सादगी जैसे आदर्श पीछे छूटते गए। परिणामस्वरूप, आदर्श और वास्तविकता के बीच दूरी बढ़ती दिखाई देती है।

यद्यपि खादी को आधुनिक रूप देने और फैशन ब्रांड के रूप में स्थापित करने के प्रयास जारी हैं, सफलता सीमित है। इसका बाजार हिस्सा इस तथ्य को स्पष्ट करता है। 2013-14 में 1,081 करोड़ रुपये से बढ़कर 2022-23 में 5,943 करोड़ रुपये तक बिक्री पहुँची, फिर भी 2023 में लगभग 7 लाख करोड़ रुपये के कुल परिधान बाजार की तुलना में यह बहुत छोटा अंश है। आज खादी सड़कों पर देशभक्ति के गर्वित प्रतीक के रूप में शायद ही दिखाई देती है।

महात्मा गांधी के सिद्धांत आज भी नैतिक मार्गदर्शन देते हैं, लेकिन स्वतंत्रता के बाद भारत का विकास उनके आदर्शों से अलग दिशा में बढ़ा है। बदलती सामाजिक प्राथमिकताओं, शहरीकरण और आर्थिक संरचनाओं के कारण यह दूरी लगातार बढ़ रही है और भविष्य में इसके और गहराने की संभावना है।



रामनाथ झा ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में एक विशिष्ट फेलो हैं।