8 सितंबर 2026 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने प्रशासनिक मनमानी पर एक करारा प्रहार करते हुए गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) की जिला मजिस्ट्रेट (DM) मेधा रूपम द्वारा एक छात्रा पर लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया। अदालत ने नोएडा में श्रमिकों के विरोध प्रदर्शन में भाग लेने वाली दिल्ली विश्वविद्यालय की 25 वर्षीय छात्रा आकृति चौधरी की अवैध हिरासत को उनके मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन माना। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरण और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने इस मामले में कड़े प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए।
अदालत ने अपने ऐतिहासिक फैसले में एक बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए चेतावनी दी कि "यदि नौकरशाही का ऐसा ही अनियंत्रित रवैया रहा, तो उत्तर प्रदेश को जॉर्ज ऑरवेल के उपन्यास जैसी 'ऑरवेलियन डिस्ट्रोपिया' (Orwellian Dystopia) यानी एक निरंकुश और दमनकारी राज्य बनने में देर नहीं लगेगी।" पीठ ने पाया कि जिला मजिस्ट्रेट ने बिना किसी ठोस सबूत, आधार और बिना दिमाग लगाए (Non-application of Mind) केवल विरोध की आवाज को दबाने और दूसरों के सामने नजीर पेश करने की मंशा से राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर कानून का दुरुपयोग किया।
मामला अप्रैल 2026 का है, जब नोएडा में न्यूनतम वेतन और काम के तय घंटों की मांग को लेकर श्रमिकों का शांतिपूर्ण प्रदर्शन चल रहा था। छात्रा आकृति चौधरी ने इस प्रदर्शन में हिस्सा लिया था। पुलिस और जिला प्रशासन ने आरोप लगाया था कि उन्होंने हिंसा भड़काने की साजिश रची, लेकिन अदालत में राज्य सरकार व्हाट्सएप मैसेज या वीडियो का एक भी ऐसा अंश पेश नहीं कर सकी जो हिंसा या दंगे को उकसाता हो। हाईकोर्ट ने माना कि यह भाषण और अभिव्यक्ति की संवैधानिक स्वतंत्रता का कानूनी प्रयोग था।
अदालत ने न केवल NSA के तहत निरुद्धी को अवैध घोषित किया, बल्कि पीड़िता आकृति चौधरी को ₹5 लाख का मुआवजा देने का ऐतिहासिक आदेश दिया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालत ने निर्देश दिया कि मुआवजे की यह राशि सरकारी खजाने से नहीं, बल्कि सीधे जिला मजिस्ट्रेट मेधा रूपम और एफआईआर व जांच रिपोर्ट तैयार करने वाले संबंधित पुलिस अधिकारियों (SHO तक) के वेतन से वसूल की जाए। इस फैसले ने प्रशासनिक अधिकारियों में हड़कंप मचा दिया है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय का यह फैसला देश के लोकतांत्रिक इतिहास में एक नजीर के रूप में याद रखा जाएगा। यह आदेश स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है कि 'राष्ट्रीय सुरक्षा कानून' जैसे असाधारण कानूनों का इस्तेमाल नागरिकों के असंतोष को दबाने या सामान्य अपराधों के विकल्प के रूप में नहीं किया जा सकता। अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही और वेतन से मुआवजे की कटौती का यह निर्देश भविष्य में किसी भी प्रशासनिक अधिकारी को अपनी शक्तियों का मनमाना और निरंकुश उपयोग करने से पहले सौ बार सोचने पर मजबूर करेगा।