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यूपी में डॉक्टरों की रिटायरमेंट उम्र 70 साल: स्वास्थ्य सेवा का कायाकल्प या नया प्रयोग?

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने राज्य की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारने की दिशा में एक ऐतिहासिक और बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने राजकीय चिकित्सा सेवाओं में कार्यरत डॉक्टरों की सेवानिवृत्ति (Retirement) की उम्र बढ़ाकर 70 वर्ष करने का बड़ा निर्णय लिया है।

कल्ट करंट डेस्क
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09 Sep 2026
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उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने राज्य की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारने की दिशा में एक ऐतिहासिक और बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने राजकीय चिकित्सा सेवाओं में कार्यरत डॉक्टरों की सेवानिवृत्ति (Retirement) की उम्र बढ़ाकर 70 वर्ष करने का बड़ा निर्णय लिया है। इस फैसले के पीछे का मुख्य उद्देश्य राज्य के सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में वरिष्ठ और अनुभवी डॉक्टरों की भारी कमी को तुरंत दूर करना है, ताकि ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले मरीजों को बेहतर इलाज मिल सके।

उत्तर प्रदेश जैसे विशाल आबादी वाले राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं पर हमेशा से अत्यधिक दबाव रहा है। यहाँ के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) से लेकर बड़े मेडिकल कॉलेजों तक में स्पेशलिस्ट और सुपर-स्पेशलिस्ट डॉक्टरों के हजारों पद सालों से खाली पड़े हैं। नए डॉक्टर अक्सर सरकारी नौकरियों में आने के बजाय निजी अस्पतालों या विदेश जाने को तरजीह देते हैं। ऐसे में, अनुभवी डॉक्टरों को 70 साल की उम्र तक सेवा में बनाए रखने से अस्पतालों में विशेषज्ञों की तत्काल उपलब्धता बनी रहेगी और नए डॉक्टरों को उनका मार्गदर्शन मिलता रहेगा।

हालाँकि, इस नीतिगत फैसले के सकारात्मक पहलुओं के साथ-साथ कुछ व्यावहारिक चुनौतियाँ भी जुड़ी हुई हैं। समर्थक जहाँ इसे राज्य के अनुभव का सही इस्तेमाल और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूती देने वाला कदम मान रहे हैं, वहीं आलोचकों का तर्क अलग है। 65 से 70 वर्ष की आयु में डॉक्टरों की शारीरिक और मानसिक कार्यक्षमता, विशेष रूप से लंबे ऑपरेशनों और इमरजेंसी ड्यूटी के दौरान, कैसी रहेगी—यह एक महत्वपूर्ण सवाल है। इसके अलावा, प्रशासनिक पदों पर वरिष्ठों के जमे रहने से युवा डॉक्टरों के प्रमोशन के रास्ते बाधित होने की चिंता भी जताई जा रही है।

इस फैसले का एक दूसरा पहलू यह भी है कि केवल डॉक्टरों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ा देने से अस्पतालों का ढांचा रातों-रात नहीं बदल जाएगा। अगर अस्पतालों में आधुनिक उपकरण, दवाइयाँ, पैरामेडिकल स्टाफ और स्वच्छ वातावरण नहीं होगा, तो 70 साल के अनुभवी डॉक्टर भी सीमित साधनों के कारण पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाएँगे। इसलिए, सरकार को इस फैसले के साथ-साथ राज्य के पूरे हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर और सपोर्टिंग स्टाफ की भर्ती प्रक्रिया पर भी उतना ही ध्यान देने की जरूरत है।

देखा जाए तो यह उत्तर प्रदेश के जन-स्वास्थ्य इतिहास में एक बड़ा प्रशासनिक प्रयोग है। यदि इसे सही तरीके से लागू किया गया और बुजुर्ग डॉक्टरों को प्रशासनिक बोझ से मुक्त रखकर केवल नैदानिक (Clinical) व शिक्षण कार्यों में लगाया गया, तो यह राज्य के लिए वरदान साबित हो सकता है। यह निर्णय देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक मॉडल बन सकता है, जो अपने यहाँ विशेषज्ञों की कमी से जूझ रहे हैं और वरिष्ठ डॉक्टरों के अनुभव का लाभ उठाना चाहते हैं।