भारतीय शेयर बाजार इन दिनों एक बेहद नाजुक और सुस्ती के दौर से गुजर रहा है। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का सूचकांक 'सेंसेक्स' और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का 'निफ्टी' दोनों ही लगातार दबाव में हैं और रेड जोन (लाल निशान) में कारोबार कर रहे हैं। बाजार की इस गिरावट के पीछे कोई एक स्थानीय कारण नहीं है, बल्कि यह वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, अमेरिका में आईटी सेक्टर पर आ रहे नए संकट और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) द्वारा लगातार की जा रही बिकवाली का एक मिला-जुला नतीजा है।
बाजार में सुस्ती का सबसे बड़ा और तात्कालिक कारण मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता सैन्य तनाव है। जब भी फारस की खाड़ी में युद्ध या तेल टैंकरों पर हमलों जैसी स्थिति बनती है, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें चढ़ने लगती हैं। भारत अपनी जरूरत का 80% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। तेल महंगा होने से भारत का चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) बढ़ता है और घरेलू मुद्रास्फीति (Inflation) की आशंका गहरा जाती है, जिससे निवेशक घबराकर शेयर बाजार से अपना पैसा निकालने लगते हैं।
इसके साथ ही, भारतीय शेयर बाजार की रीढ़ माने जाने वाले आईटी (IT) सेक्टर के शेयरों में आई भारी गिरावट ने सूचकांकों को नीचे खींचने का काम किया है। अमेरिका में वीजा नियमों के कड़े होने और कॉग्निजेंट जैसी कंपनियों पर हुई कार्रवाई के कारण भारतीय आईटी कंपनियों के राजस्व (Revenue) और प्रॉफिट मार्जिन पर खतरा मंडराने लगा है। चूंकि निफ्टी और सेंसेक्स में आईटी कंपनियों का वजन (Weightage) काफी अधिक है, इसलिए TCS, Infosys और HCL जैसी दिग्गज कंपनियों के शेयरों में बिकवाली का सीधा असर पूरे बाजार के सेंटिमेंट पर पड़ता है।
इसके अलावा, वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) का भारतीय बाजार के प्रति रुख रक्षात्मक हो गया है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में कटौती को लेकर स्पष्टता न होना और अमेरिकी डॉलर का मजबूत होना निवेशकों को सुरक्षित विकल्पों (जैसे अमेरिकी बॉन्ड और सोना) की तरफ आकर्षित कर रहा है। इसके चलते, भारतीय बाजारों से भारी पूंजी बाहर जा रही है, जिसे घरेलू संस्थागत निवेशक (DIIs) और रिटेल निवेशक चाहकर भी पूरी तरह से संभाल नहीं पा रहे हैं।
शेयर बाजार का यह मौजूदा दौर खुदरा (Retail) और छोटे निवेशकों के लिए बेहद धैर्य की परीक्षा लेने वाला है। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि जब तक मध्य पूर्व में तनाव कम नहीं होता और अमेरिकी आर्थिक नीतियों में स्थिरता नहीं आती, तब तक बाजार में उतार-चढ़ाव (Volatility) और सुस्ती बनी रहेगी। लंबे समय के निवेशकों के लिए यह घबराने का नहीं, बल्कि बुनियादी रूप से मजबूत (Fundamentally Strong) कंपनियों में अनुशासन के साथ एसआईपी (SIP) के जरिए निवेश बनाए रखने का सही समय है।