केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण घटनाक्रम के तहत 8वें वेतन आयोग की टीम पुडुचेरी में एक दिवसीय परामर्श बैठक कर रही है। चेन्नई में दो दिनों की गहन चर्चा के बाद आयोग की टीम कर्मचारी संघों, राज्य प्रतिनिधियों और पेंशनभोगी संगठनों से सीधी बातचीत कर रही है। यह बैठक कर्मचारियों के नए वेतनमान, महंगाई भत्ते (DA), पेंशन संशोधन और फिटमेंट फैक्टर (Fitment Factor) की भविष्य की दिशा तय करने में मील का पत्थर साबित हो सकती है।
इस बार की परामर्श बैठकों में सबसे बड़ा विवाद 1 जनवरी 2026 से पहले सेवानिवृत्त हुए पेंशनभोगियों (Pre-2026 Retirees) की पेंशन संशोधन पात्रता को लेकर है। 'रिटायर्ड एम्प्लॉइज वेलफेयर एसोसिएशन' (REWA) ने आयोग के संदर्भ शर्तों (Terms of Reference - ToR) की भाषा पर आपत्ति जताते हुए सीधे प्रधानमंत्री से गुहार लगाई है कि पुराने पेंशनभोगियों को स्पष्ट रूप से 8वें वेतन आयोग के दायरे में शामिल किया जाए। इस अनिश्चितता के कारण देश के लगभग 69 लाख पेंशनभोगी और उनके परिवार असमंजस की स्थिति में हैं।
कर्मचारी संगठन इस बार केवल 3% के पारंपरिक वार्षिक वेतन वृद्धि दर से संतुष्ट नहीं हैं, बल्कि वे 5% से 7% तक की वार्षिक वेतन वृद्धि (Annual Increment) या 2.15 से अधिक के फिटमेंट फैक्टर की मांग कर रहे हैं। संगठनों का तर्क है कि पिछले कुछ वर्षों में जिस तेजी से महंगाई और जीवन-यापन की लागत बढ़ी है, उसे देखते हुए निचले और मध्यम स्तर के कर्मचारियों के मूल वेतन (Basic Salary) में बड़ा सुधार होना बेहद जरूरी है।
दूसरी ओर, केंद्र और राज्य सरकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती वित्तीय संतुलन साधने की है। 8वें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने से सरकारी खजाने पर लाखों करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। पुडुचेरी जैसी केंद्र शासित प्रदेश की सरकारों के लिए अपने प्रशासनिक खर्चों को संभालते हुए नए वेतनमान को लागू करना एक बड़ी चुनौती होगी, जिसके लिए उन्हें केंद्र से अतिरिक्त वित्तीय सहायता की जरूरत पड़ेगी।
पुडुचेरी की यह बैठक यह साफ करती है कि 8वां वेतन आयोग अब केवल औपचारिक कागजी कार्रवाई नहीं रहा, बल्कि यह धरातल पर आकार ले रहा है। आयोग द्वारा तैयार की जाने वाली अंतिम रिपोर्ट न केवल सरकारी कर्मचारियों की जेब पर असर डालेगी, बल्कि यह देश की समग्र अर्थव्यवस्था और उपभोग (Consumption) को भी नई गति देगी।