पश्चिम एशिया में जारी सुरक्षा संकट ने 12 सितंबर 2026 को एक बेहद गंभीर मोड़ ले लिया। यमन के हूती विद्रोही गुटों ने बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य में स्थित रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण मायुन (Mayun) द्वीप पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। इस इलाके में हूतियों की मजबूत पकड़ ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और तेल टैंकरों के सुरक्षित आवागमन पर बड़ा खतरा पैदा कर दिया है।
इस सैन्य घटनाक्रम के तुरंत बाद सऊदी अरब सरकार ने अपनी सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए प्रमुख क्रूड ऑयल पाइपलाइनों से तेल की आपूर्ति को अस्थायी रूप से निलंबित करने का बड़ा फैसला लिया। सऊदी प्रशासन का मानना है कि रेड सी (लाल सागर) के मुहाने पर विद्रोही बलों का जमावड़ा किसी भी समय तेल टैंकरों पर हमले या समुद्री नाकेबंदी का कारण बन सकता है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार बुरी तरह प्रभावित हो सकता है।
ईरान और अन्य क्षेत्रीय ताकतों की इसमें अप्रत्यक्ष संलिप्तता के आरोपों के बीच इस पूरे क्षेत्र में एक नया मोर्चा खुल गया है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि बाब अल-मंदेब के इस मार्ग को जल्द सुचारू नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है।
यह संकट न केवल मध्य पूर्व के देशों बल्कि भारत और यूरोपीय देशों जैसे प्रमुख तेल आयातकों के लिए भी बड़ी चुनौती है। समुद्री जहाजों को अब केप ऑफ गुड होप के लंबे और खर्चीले रास्ते से जाने पर मजबूर होना पड़ रहा है, जिससे लॉजिस्टिक्स लागत और माल ढुलाई के समय में भारी वृद्धि तय मानी जा रही है।
निष्कर्षतः, मायुन द्वीप पर कब्जे और सऊदी की त्वरित जवाबी कार्रवाई ने यह साबित कर दिया है कि पश्चिम एशिया का तनाव अब केवल ज़मीनी संघर्ष तक सीमित न रहकर वैश्विक सप्लाई चेन की लाइफलाइन को ठप करने के मोड़ पर पहुँच चुका है। संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा परिषद पर अब इस जलमार्ग को सुरक्षित कराने का भारी दबाव है।