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ग्रीनलैंड पर ट्रम्प का महादावा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर एक ऐसा ऐलान किया है जिसने वैश्विक कूटनीति में भूचाल ला दिया है। ट्रम्प ने घोषणा की है कि अमेरिका बहुत जल्द ग्रीनलैंड के विशाल प्राकृतिक संसाधनों, तेल, गैस और दुर्लभ खनिजों (Rare Earth Minerals) के उत्खनन और अन्वेषण का काम शुरू करने जा रहा है

कल्ट करंट डेस्क
कल्ट करंट डेस्क
15 Oct 2026
Solar farm during sunset

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर एक ऐसा ऐलान किया है जिसने वैश्विक कूटनीति में भूचाल ला दिया है। ट्रम्प ने घोषणा की है कि अमेरिका बहुत जल्द ग्रीनलैंड के विशाल प्राकृतिक संसाधनों, तेल, गैस और दुर्लभ खनिजों (Rare Earth Minerals) के उत्खनन और अन्वेषण का काम शुरू करने जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि डेनमार्क और ग्रीनलैंड के साथ हुए सुरक्षा समझौते के तहत अमेरिका को यह अधिकार मिला है। ट्रम्प के इस बयान से यूरोपीय संघ और नाटो के सहयोगियों में भारी खलबली मच गई है।  

ट्रम्प के इस आक्रामक दावे पर डेनमार्क सरकार ने करारा पलटवार किया है। कोपेनहेगन ने तुरंत आधिकारिक बयान जारी कर ट्रम्प के दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। डेनमार्क का कहना है कि अमेरिका के साथ हुआ समझौता केवल सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग तक सीमित है, उसमें खनन या तेल निकालने का कोई अधिकार शामिल नहीं है। डेनमार्क ने सख्त लहजे में कहा कि ग्रीनलैंड की संप्रभुता के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा और अमेरिकी प्रशासन का यह रुख अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन है।  

आर्कटिक क्षेत्र में शुरू हुआ यह नया तनाव वास्तव में 'ग्रीन एनर्जी' और सेमीकंडक्टर तकनीक पर वर्चस्व की जंग है। ग्रीनलैंड के बर्फ के नीचे भारी मात्रा में रेयर अर्थ एलिमेंट्स दबे हैं, जिन पर फिलहाल चीन का लगभग एकाधिकार माना जाता है। अमेरिका किसी भी कीमत पर चीन के इस दबदबे को तोड़ना चाहता है। लेकिन अपने ही पश्चिमी सहयोगियों और नाटो पार्टनर डेनमार्क को दरकिनार कर जबरन संसाधनों पर कब्जा करने की ट्रम्प की यह नीति ट्रांस-अटलांटिक संबंधों में दरार डाल रही है।  

भारतीय परिप्रेक्ष्य में, ग्रीनलैंड और आर्कटिक की यह जियोपॉलिटिक्स बहुत मायने रखती है। भारत अपनी 'आर्कटिक नीति' के तहत इस क्षेत्र में सतत अनुसंधान और जलवायु अध्ययन कर रहा है। इसके अलावा, भारत अपनी इलेक्ट्रॉनिक्स और इलेक्ट्रिक वाहन (EV) क्रांति के लिए रेयर अर्थ खनिजों की आपूर्ति श्रृंखला को विविधता देना चाहता है। अगर आर्कटिक क्षेत्र अमेरिका, चीन और यूरोप के बीच महासंग्राम का मैदान बनता है, तो वैश्विक सप्लाई चेन ठप हो जाएगी और भारत की टेक-इंडस्ट्री पर इसका बुरा असर पड़ेगा।

अंतर्राष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि ट्रम्प का यह कदम केवल खनिजों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उत्तरी ध्रुव पर सैन्य बेस स्थापित करने की सोची-समझी रणनीति है। रूस और चीन पहले से ही आर्कटिक मार्गों पर अपनी पैठ मजबूत कर रहे हैं। ऐसे में अमेरिका का ग्रीनलैंड पर एकतरफा दावा नाटो गठबंधन को अंदर से कमजोर कर सकता है, जिससे वैश्विक शक्ति संतुलन बिगड़ने का पूरा खतरा पैदा हो गया है।

दुनिया अब यह देखने के लिए उत्सुक है कि क्या डेनमार्क अमेरिकी दबाव के सामने घुटने टेकेगा या यह विवाद किसी बड़े कूटनीतिक युद्ध का रूप लेगा। एक बात तो तय है—बर्फ से ढका ग्रीनलैंड अब वैश्विक राजनीति का सबसे गर्म हॉटस्पॉट बन चुका है, और इसकी लपटें पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने की ताकत रखती हैं।

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