संयुक्त राष्ट्र (UN) के पर्यावरण मंच से आज दुनिया के लिए एक बेहद डरावनी और सनसनीखेज रिपोर्ट जारी हुई है, जिसने वैश्विक समुदाय को हिलाकर रख दिया है। नवीनतम वैज्ञानिक आकलन और जलवायु रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए तय किए गए लक्ष्य समय से काफी पीछे छूट चुके हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि आने वाले चार वर्षों में वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भारी कटौती नहीं की गई, तो मानवता एक अपूरणीय जलवायु आपदा की ओर बढ़ जाएगी।
इस रिपोर्ट में विशेष रूप से अमेरिका और अन्य प्रमुख विकसित अर्थव्यवस्थाओं की नीतियों की आलोचना की गई है, जो अपने जलवायु वादों को पूरा करने में सुस्त साबित हो रही हैं। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि वैश्विक तापमान में मामूली सी वृद्धि भी दुनिया भर में विनाशकारी बाढ़, भीषण हीटवेव, सूखे और कृषि फसलों के बड़े पैमाने पर बर्बाद होने का कारण बनेगी।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह चेतावनी बहुत ही गंभीर और सीधे तौर पर अस्तित्व से जुड़ी है। भारत जैसे विकासशील देश, जो मानसून और कृषि पर आधारित हैं, जलवायु परिवर्तन के सबसे बुरे प्रभावों का सामना कर रहे हैं। उत्तर भारत में प्रदूषण का संकट हो या देश के विभिन्न हिस्सों में मौसम का अतिवादी व्यवहार, यह सब बदलती जलवायु के प्रत्यक्ष परिणाम हैं।
भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हमेशा यह स्पष्ट किया है कि वह अपने स्तर पर रिन्यूएबल एनर्जी (सौर और पवन ऊर्जा) के विस्तार में तेजी ला रहा है, लेकिन विकसित देशों को अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी निभाते हुए विकासशील देशों को वित्तीय सहायता और हरित तकनीक का हस्तांतरण करना चाहिए।
यदि वैश्विक स्तर पर ये जलवायु लक्ष्य विफल होते हैं, तो भारत की खाद्य सुरक्षा, जल संसाधन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भारी संकट आ सकता है। देश के नीति निर्माताओं को अब और अधिक आक्रामक रूप से जलवायु-रोधी बुनियादी ढाँचे (Climate-Resilient Infrastructure) और आपदा प्रबंधन प्रणालियों को मजबूत करना होगा।
यह रिपोर्ट मानवता को यह याद दिलाने के लिए काफी है कि सीमाओं पर लड़े जाने वाले भू-राजनीतिक युद्धों से कहीं अधिक बड़ा और खतरनाक संकट हमारी अपनी धरती पर मंडरा रहा है, जिससे निपटने के लिए पूरी दुनिया को बिना किसी राजनीतिक भेदभाव के एकजुट होना होगा।
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