मध्य पूर्व से ही एक अन्य सनसनीखेज खबर आ रही है, जहाँ सामरिक सुरक्षा को और अधिक सुदृढ़ करने के लिए ब्रिटेन ने एक बड़ा कदम उठाया है। रिपोर्टों के अनुसार, ब्रिटेन अपनी रॉयल एयर फोर्स (RAF) के अत्याधुनिक फाइटर जेट्स और रक्षा टुकड़ियों को सीधे सऊदी अरब की सीमा पर तैनात कर रहा है, ताकि यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा लगातार किए जा रहे मिसाइल और ड्रोन हमलों से सऊदी क्षेत्र की रक्षा की जा सके।
यह सैन्य तैनाती इस बात का संकेत है कि पश्चिमी देश अब खाड़ी के ऊर्जा बुनियादी ढाँचों को बचाने के लिए सीधे तौर पर मैदान में उतर रहे हैं। पिछले कुछ समय से सऊदी अरब के तेल भंडारों और रिफाइनरियों पर लगातार हो रहे हवाई हमलों ने वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा की नींव हिला दी थी, जिसके बाद यह सुरक्षा समझौता किया गया है।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में सऊदी अरब भारत का एक प्रमुख रणनीतिक और ऊर्जा साझेदार है। रियाद और उसके औद्योगिक क्षेत्रों की सुरक्षा का सीधा संबंध भारत की तेल शोधन और ऊर्जा आपूर्ति से है। यदि पश्चिमी वायु रक्षा प्रणालियों के सहयोग से इस क्षेत्र में शांति बहाल होती है, तो भारत के लिए कच्चे तेल की निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित हो सकेगी।
तथापि, इस क्षेत्र में विदेशी सैन्य हस्तक्षेप का बढ़ना इस बात का भी प्रमाण है कि मध्य पूर्व की भू-राजनीति कितनी जटिल और संवेदनशील हो चुकी है। युद्ध के इन सायों के बीच भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर कायम रहते हुए यह सुनिश्चित कर रहा है कि उसकी ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हित किसी भी प्रकार से खतरे में न पड़ें।
व्यापारिक दृष्टिकोण से, लाल सागर और अरब सागर के रास्तों पर मंडरा रहे इन खतरों के कारण भारतीय निर्यातकों को पहले ही माल भाड़े और बीमा के रूप में भारी अतिरिक्त लागत चुकानी पड़ रही है। ब्रिटेन और अन्य ताकतों के इस सैन्य कदम से यदि समुद्री मार्गों पर सुरक्षा बढ़ती है, तो भारतीय शिपिंग और निर्यात उद्योग को बड़ी राहत मिलेगी।
भारत सरकार इस पूरे घटनाक्रम पर बारीक नजर बनाए हुए है। नई दिल्ली यह मानती है कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए कूटनीतिक संवाद और सुरक्षित समुद्री मार्ग अत्यंत आवश्यक हैं, और भारत अपने सभी साझेदारों के साथ मिलकर इस दिशा में निरंतर सक्रिय है।
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