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जी-7 जलवायु खींचतान

यूरोप के प्रमुख शहर में आयोजित जी-7 (G-7) शिखर सम्मेलन के दौरान सदस्य देशों के बीच व्यापार, वैश्विक कर नीतियों और जलवायु वित्तपोषण (Climate Finance) को लेकर तीखी बहस देखने को मिली। अंतर्राष्ट्रीय मीडिया कवरेज के अनुसार

कल्ट करंट डेस्क
कल्ट करंट डेस्क
23 Oct 2026
Solar farm during sunset

यूरोप के प्रमुख शहर में आयोजित जी-7 (G-7) शिखर सम्मेलन के दौरान सदस्य देशों के बीच व्यापार, वैश्विक कर नीतियों और जलवायु वित्तपोषण (Climate Finance) को लेकर तीखी बहस देखने को मिली। अंतर्राष्ट्रीय मीडिया कवरेज के अनुसार, विकसित देशों के बीच व्यापारिक संरक्षणवाद (Protectionism) और नई तकनीकों के नियमन को लेकर गहरे मतभेद उजागर हुए हैं। कुछ देश जहाँ कार्बन बॉर्डर टैक्स लगाने पर अड़े हैं, वहीं अन्य देश इसे वैश्विक व्यापार के लिए खतरा मान रहे हैं।

इसके अतिरिक्त, विकासशील और गरीब देशों को दिए जाने वाले क्लाइमेट फंड को लेकर भी जी-7 देश किसी एक राय पर नहीं पहुँच सके हैं। कई यूरोपीय देशों का तर्क है कि मौजूदा आर्थिक चुनौतियों को देखते हुए भारी वित्तीय योगदान देना मुश्किल है, जबकि पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए धन का न मिलना एक बड़ी वैश्विक विफलता होगी।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में जी-7 की यह खींचतान और नीतियाँ बेहद मायने रखती हैं। जी-7 देशों द्वारा प्रस्तावित 'कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म' (CBAM) जैसी नीतियाँ भारतीय उद्योगों के लिए एक बड़ा खतरा हैं। इसके तहत यदि भारत से स्टील, एल्युमीनियम और सीमेंट जैसी चीजें यूरोप या जी-7 देशों में निर्यात की जाती हैं, तो उन पर भारी कार्बन टैक्स लगाया जाएगा, जिससे भारतीय उत्पाद महंगे हो जाएंगे।

भारत लगातार अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर यह मुद्दा उठाता रहा है कि विकासशील देशों पर अनुचित टैक्स थोपने के बजाय विकसित देशों को अपनी जलवायु प्रतिबद्धताओं को पूरा करना चाहिए और उन्हें सस्ती हरित तकनीक (Green Technology) हस्तांतरित करनी चाहिए। जी-7 में हो रही इस खींचतान से भारत को अपनी निर्यात रणनीति में बड़े बदलाव करने पड़ सकते हैं।

इसके अलावा, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) को चीन से अलग कर भारत जैसे मित्र राष्ट्रों में स्थानांतरित करने (Friend-shoring) की जो बात जी-7 करता रहा है, उस पर भी अंदरूनी मतभेदों के कारण सुस्ती आ रही है। अगर जी-7 देश आपसी व्यापारिक विवादों में उलझे रहते हैं, तो 'मेक इन इंडिया' के तहत आने वाले विदेशी निवेश की गति प्रभावित हो सकती है।

जी-7 देशों के आंतरिक मतभेद केवल पश्चिमी दुनिया तक सीमित नहीं हैं। उनके द्वारा लिए गए व्यापारिक और पर्यावरणीय निर्णय भारत की विकास दर, निर्यात क्षमता और जलवायु नीतियों को सीधे प्रभावित करने वाले हैं, जिस पर नई दिल्ली को रणनीतिक संतुलन बनाना होगा।

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