देश की राजधानी दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में रहने वाले 3 करोड़ नागरिकों के स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़ी आज की सबसे खतरनाक और सनसनीखेज खबर सामने आई है। राजधानी में सिस्टम ऑफ एयर क्वालिटी एंड वेदर फोरकास्टिंग एंड रिसर्च (SAFAR) के अनुसार वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 480 के पार पहुँचकर 'गंभीर+' (Severe+) श्रेणी में दर्ज किया गया है।
चारों तरफ छाई जहरीली धुंध (Smog) और दृश्यता (Visibility) शून्य के करीब पहुँचने के बाद वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने पूरे दिल्ली-एनसीआर में 'ग्रेप-4' (GRAP Phase-IV) के कड़े प्रतिबंधों को तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया है।
इसके तहत प्राथमिक व माध्यमिक स्कूलों को ऑनलाइन मोड में शिफ्ट कर दिया गया है, जबकि सभी गैर-आवश्यक वाणिज्यिक ट्रकों के प्रवेश पर रोक लगा दी गई है। इसके साथ ही निजी और सरकारी दफ्तरों को 50% क्षमता के साथ 'वर्क फ्रॉम होम' के निर्देश दिए गए हैं।
भारतीय सामाजिक परिप्रेक्ष्य में हर साल जाड़ों की शुरुआत में आने वाली यह हवा की आपातकालीन स्थिति (Public Health Emergency) राजधानी के बच्चों, बुजुर्गों और अस्थमा के मरीजों की जिंदगी पर मंडराता सबसे बड़ा सामाजिक-स्वास्थ्य संकट बन चुकी है।
पर्यावरणविदों और डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि इस जहरीली हवा में सांस लेना रोजाना 25 से 30 सिगरेट पीने के बराबर खतरनाक है। सरकारें एक-दूसरे पर दोषारोपण कर रही हैं, जबकि पराली जलाने और वाहनों के धुएँ पर कोई स्थायी हल नहीं निकल पा रहा है।
यह संकट एक बार फिर यह कड़ा सवाल खड़ा करता है कि अगर हम अपने नागरिकों को साफ हवा नहीं दे सकते, तो बुनियादी ढांचे के विकास का कोई भी दावा अधूरा और बेमानी है।
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