और आखिरकार बॉलीवुड ने अदालत के दरवाज़े खटखटा दिए. बॉलीवुड के चार संगठनों और 34 हस्तियों ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर कर बॉलीवुड को लेकर मीडिया में चल रहे दुष्प्रचार को रोकने की मांग की है. इन्होंने देश के दो बड़े राष्ट्रवादी न्यूज़ चैनलों और उसके संपादकीय कर्ता-धर्ताओं के नाम लेते हुए बॉलीवुड के खिलाफ चलाए जा रहे उनके कुप्रचार अभियान पर रोक लगाने की मांग की है. आखिर बॉलीवुड को क्यों लगता है कि नरेंद्र मोदी की सरकार उनके खिलाफ है. और मोदी सरकार को क्यों लग रहा है कि बॉलीवुड उनके खिलाफ है
ये मामला आज का नहीं, पुराना है…पहले देखें कि बॉलीवुड की दिक्कत क्या है.बॉलीवुड में कलाकार से लेकर टेक्नीशियन्स तक बगैर किसी मज़हबी भेदभाव के आपस में मिल कर काम करते रहते हैं. इंडस्ट्री के लिए ज़रूरी भी है कि वो ऐसी फिल्म बनाए जिसे हर धर्म,लिंग, जाति, आयु वर्ग के लोग एक साथ बैठ कर फिल्म देखें औऱ बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी मिल सके. इसीलिए रहमान चाचा या कोई एक मुसलमान चरित्र अभिनेता की तरह कहानियों में फिल्मों की शुरुआत से देखा जाता रहा है. फिल्म काबुलीवाला से लेकर हाल की फिल्मों तक कहानियों में मिलीजुली संस्कृति और गंगा-जमुनी तहज़ीब को तवज्जो दी जाती रही है. लेकिन जब देश की राजनीति और समाज दो ध्रुव में बंटा जा रहा हो तो कौमी एकता और भाईचारे की बात वैसी विवादास्पद हो जाती है जैसे टाटा के तनिष्क ब्रांड के विज्ञापन को लेकर विवाद खड़ा हो गया है.
सांप्रदायिक सद्भाव की बात बॉलीवुड की व्यवसायिक मजबूरी भी है क्योंकि धर्म के आधार पर बंटवारे से दर्शकों की तादाद में कमी आती है. इसीलिए बॉलीवुड की शुरुआत से ही इंडस्ट्री में मेलजोल की संस्कृति विकसित हुई. इप्टा के प्रभाव ने बरसों तक बॉलीवुड में दरार नहीं आने दी. यहां तक कि निशान-ए-पाकिस्तान पाने के बावजूद दिलीप कुमार से शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे की निकटता बनी रही. हिदुत्व की बात करने वाली शिवसेना ने भी बॉलीवुड को इस सोच से अलग रख कर देखा. बल्कि बाल ठाकरे की दिलीप कुमार से दोस्ती खासी मशहूर रही.
लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सोच शिवसेना से अलग है. संघ अपने वैचारिक धरातल के विस्तार के लिए मीडिया पर कब्जे को ज़रूरी समझता है. अगर धर्म के आधार पर बंटवारा नहीं तो उनके वोटबैंक का विस्तार भी संभव नहीं है. संघ की प्रचारतंत्र को लेकर समझ बहुत विकसित रही है. क्योंकि उसके पास देश और स्वाधीनता के लिए त्याग-तपस्या और योगदान की कोई खास विरासत नहीं है. बल्कि संघ के खिलाफ आजादी की लड़ाई में आंदोलनरत अखिल भारतीय कांग्रेस के विरुद्ध और अंग्रेज सरकार के पक्ष में खड़े होने की तमाम मिसाल दी जाती रही हैं. महात्मा की हत्या के बाद से संघ को अपने वजूद के लिए जरूरी था कि वो विरोधी राजनीतिक विचारधारा और उसके समर्थकों की कमियों-खामियों को उजागर कर अपनी महत्ता स्थापित करे. पिछले करीब सौ सालों से नकारात्मक प्रचार ही संघ की विशेषता रही है.
मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री हमेशा दक्षिणपंथियों की आखों में खटकती रही है. माफिया डॉन दाऊद इब्राहीम के ब़ॉलीवुड पर वर्चस्व को लेकर पूरे बॉलीवुड को निशाने पर लिया जाता रहा है. दुबई में माफिया डॉन की पार्टियों में अभिनेताओं, निर्माता-निर्देशकों की शिरकत को ले कर खूब सुर्खियां बनती रही है. इसके साथ ही हिंदू-मुसलमान और अपराध जगत से जुड़े नेरेटिव शुरुआत से गढ़े गए- खान ही क्यों होते हैं सुपरस्टार, इनकी कामयाबी के पीछे है दाऊद..दुबई से दाऊद का साम्राज्य ही चलाता है बॉलीवुड- इसीलिए कोई हिंदू सुपरस्टार नहीं बन पाता वगैरह-वगैरह. लेकिन ऐसा कहने वाले अमिताभ, धर्मेद्र, राजेश खन्ना, से लेकर अक्षय कुमार, अजय देवगन तक की कामयाबी भूल जाते हैं.
हालांकि धीरे-धीरे बॉलीवुड की हर हरकत के पीछे दुबई और दाऊद के हाथ की कयासबाज़ी और खबरें कम होती गईं. लेकिन बहुत से नाकाम निर्देशक, निर्माता, अभिनेता-अभिनेत्री, संगीतज्ञ और गायकों ने इस नेरेटिव को ज़िंदा रखा और अपनी नाकामी का ठीकरा इसी नेक्सस पर फोड़ा. इसे संघ ने अपने मुस्लिमों के खिलाफ घृणा प्रचार के लिए एक विमर्श में तब्दील कर दिया. बल्कि सच्चाई ये है कि संघ के इस विमर्श को नकारा-नाकाम लोगों ने अपनी कमिया छिपाने के लिए ओढ़ लिया.
हालांकि इसमें कोई संदेह नहीं कि समाज के हर वर्ग की तरह बॉलीवुड में भी कड़ी व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा के बावजूद सबकी अपनी राजनीतिक सोच रही है. लिहाज़ा बॉलीवुड सेलिब्रिटीज़ अपनी पसंद की राजनीतिक पार्टिय़ों के लिए प्रचार करते रहे हैं. राजनीतिक दल भी भीड़ जुटाने के लिए इनकी मोहताज़ रही हैं. और कमज़ोर सीट पर हीरो-हिरोइन को चुनाव में उतारने का भी खेल इसीलिए होता रहा. लेकिन सिर्फ ये वजह नहीं है. इप्टा ने रंगमंच और बॉलीवुड को देश में बदलाव के माध्यम के रूप में देखा. बहुत से रंगधर्मी-कलाधर्मी इसी मकसद से बॉलीवुड में आए. साथ ही समानांतर सिनेमा की शुरुआत हुई. दक्षिणपंथ को भी सिनेमा का महत्व महसूस हुआ. हालांकि धार्मिक फिल्में देश में धर्म के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाने का काम करती रहीं. लेकिन राजनीतिक उद्देश्य से फिल्म बनाने और बनवाने की दिशा में अब जा कर संघ और बीजेपी ने सक्रिय रूप से कदम बढ़ाए हैं.
नरेंद्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल से ही फिल्मी सेलिब्रिटीज़ को इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. अमिताभ बच्चन गुजरात सरकार के विज्ञापनों के साथ देश के शासकीय विज्ञापनों में सरकार के एंबेस्डर के रूप में दिखाई दिए. विवेक ओबेरॉय, अनुपम खैर, कंगना रानावत,विवेक अग्निहोत्री, परेश रावल समेत बहुत से नामचीन कलाकार प्रधानमंत्री मोदी से सीधे जुड़ने लगे. करीब बॉलीवुड से जुड़े करीब 900 लोगों ने एक मुहिम छेड़ कर मजबूर सरकार के बजाय मजबूत सरकार की अपील की. तो दूसरी तरफ करीब 600 हस्तियों ने धर्म निरपेक्ष पार्टी को वोट देने की अपील कर डाली. संघ और बीजेपी ने बॉलीवुड में ध्रुवीकरण के बीज डाल दिए. संघ और बीजेपी ने दक्षिणपंथी विचार को मजबूत करने के लिए खास तरीके की राजनीतिक फिल्में बनवाना भी शुरू कर दिया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर बनी फिल्म इस अक्टूबर में दोबारा रिलीज़ करने की योजना बनाई गई है. तो राजनीतिक उद्देश्य से उरी: सर्जिकल स्ट्राइक,ताशकंद फाइल्स, एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर, टॉयलेट: एक प्रेम कथा जैसी फिल्में.
ये सब एक दिन की बात नहीं, सत्तर साल दिन-रात योजाबद्ध तरीके से भारत के लोकतंत्र को हाईजैक करने की तैयारी संघ समर्थित संस्थाओं ने की है. इन संस्थाओं ने चिंतक, प्रशासक और रणनीतिकार भी तैयार किए और उन्हें देश में हर महत्वपूर्ण जगहों में स्थापित होने में मदद की. कांग्रेस या दूसरी पार्टियों के सेकुलरिज्म पर संदेह करने वाले, लेकिन संघ को नापसंद करने वाले पत्रकारों, बुद्धिजीवियों को भी आमंत्रित कर उनमें सत्कार से संघ के प्रति स्वीकार भाव पैदा किया जाता है. जो वैचारिक धरातल पर विरोध करते हैं उनका गौरी लंकेश, नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे और एमएम कलबुर्गी जैसा हश्र होता है. सवाल पूछा जा रहा है कि उद्धव ठाकरे वाली महाराष्ट्र सरकार ने ऐलान के बावजूद जांच से हाथ पीछे क्यों खींच लिए. यहां ये बताना ज़रूरी नहीं कि इन अपराधों को संस्थागत तरीके से अंजाम दिया गया हो, लेकिन वैचारिक प्रचार से उत्तेजित और हिंसक बन जाने वाले नाथूराम गोडसे जैसे लोग हिंसक कदम उठा कर किस विचारधारा को फायदा पहुंचाते हैं, ये तो किसी से छिपा नहीं है. इसीलिए आज के दौर में अहिंसा को कायरता के रूप में प्रदर्शित किया जाता है. नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भीड़ की हिंसा के मामले बहुत तेज़ी से बढ़े. हो सकता है कि इस तरह के मामले पहले भी होते रहे हों लेकिन उद्देश्यपूर्ण तरीका 2014 के बाद की घटनाओं से जगजाहिर हैं. दरअसल, अपने पहले कार्यकाल में मोदी सरकार ने बहुत सोचे समझे तरीके से देश का माहौल बदला. गो रक्षकों को खुल कर आतंक फैलाने की आजादी मिल गई. लव जिहाद रोकने के नाम पर पुलिस और धर्मरक्षकों को मनमानी की आजादी, गोमांस के नाम पर घर में घुसने, दुकानें और गाड़ियों पर हमले की आजादी, लगातार ऐसे उदाहरण सामने आए, मोदीजी को कहना पड़ा-दलित को मत मारो, मारना है तो मुझे मारो. यानि हिंसा से परहेज नहीं है, लेकिन पीएम मिन्नत कर रहा है कि मुझे मार लो, इन्हें नहीं. संदेश साफ था- वैदिकी हिंसा, हिंसा ना भवति.