1.आज 15 सितंबर है—हिंदी के महत्त्वपूर्ण कवि, लेखक, पत्रकार, नाटककार और बाल-साहित्यकार सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की जन्मतिथि। 15 सितंबर 1927 को उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में जन्मे सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने हिंदी साहित्य को केवल कविताएँ नहीं दीं, बल्कि अपने समय की बेचैनी, राजनीतिक विडंबनाओं, सामाजिक असमानताओं और मनुष्य की जिजीविषा को शब्द दिए। वे ‘नई कविता’ के उन रचनाकारों में थे जिन्होंने कविता को कल्पना के धुँधलके से निकालकर जीवन के कठोर धरातल पर प्रतिष्ठित किया। उनका साहित्य अपने समय का दर्पण होने के साथ-साथ उसकी अंतरात्मा की आवाज भी है। उनके भीतर का कवि सत्ता से सवाल करता है, पत्रकार समाज की नब्ज टटोलता है, नाटककार व्यवस्था के मुखौटे उतारता है और बाल-साहित्यकार बच्चों की दुनिया में सहज कल्पना का उजास भरता है। इसलिए सर्वेश्वर का कृति-कर्म एकांगी नहीं, बल्कि बहुआयामी और व्यापक मानवीय सरोकारों से निर्मित है।
2.सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का साहित्यिक गठन ऐसे समय में हुआ जब देश स्वतंत्रता के बाद नए सपनों, नए संघर्षों और नई निराशाओं से गुजर रहा था। औपनिवेशिक शासन समाप्त हो चुका था, लेकिन गरीबी, शोषण, बेरोजगारी और सामाजिक विषमता अभी भी मौजूद थी। स्वतंत्रता के आदर्श और वास्तविक जीवन की विसंगतियों के बीच जो दूरी पैदा हुई, वही सर्वेश्वर की कविता का एक प्रमुख तनाव बनती है। उन्होंने राष्ट्र और समाज को केवल उत्सवधर्मी दृष्टि से नहीं देखा, बल्कि उसके भीतर छिपी दरारों को भी पहचाना। उनकी प्रसिद्ध पंक्तियाँ—“लीक पर वे चलें / जिनके चरण दुर्बल और हारे हैं”—उनकी रचनात्मक मुद्रा को स्पष्ट करती हैं। वे परंपरागत सुरक्षित रास्तों के कवि नहीं थे; वे जोखिम, प्रतिरोध और आत्मसंघर्ष के कवि थे। उनके लिए कविता फूलों की सजावट नहीं, बल्कि अँधेरे में रास्ता खोजती हुई मनुष्य की आँख थी।
3.सर्वेश्वर की कविताओं में साधारण मनुष्य असाधारण गरिमा के साथ उपस्थित होता है। किसान, मजदूर, निम्न-मध्यवर्गीय व्यक्ति, भूखा बच्चा, अकेली स्त्री, भयभीत नागरिक और संघर्षरत युवा—ये सब उनके काव्यलोक के केंद्रीय पात्र हैं। उन्होंने जीवन को दूर से निहारकर नहीं, बल्कि उसके बीच उतरकर समझा। उनकी भाषा में बोलचाल की सहजता है, पर यह सहजता सतही नहीं है। वे सरल शब्दों में जटिल अनुभव व्यक्त करते हैं। “मैं नया कवि हूँ / इसी से जानता हूँ / सत्य की चोट बहुत गहरी होती है”—जैसी पंक्तियों में उनकी काव्य-दृष्टि का आत्मस्वीकार दिखाई देता है। उनके यहाँ ‘नयापन’ केवल शिल्प का प्रयोग नहीं, बल्कि यथार्थ को देखने की नई दृष्टि है। वे कविता को भावुक आत्मप्रदर्शन से मुक्त करके सामाजिक अनुभव, नैतिक विवेक और जन-संवेदना से जोड़ते हैं।
4.उनका काव्य-संसार प्रेम, प्रकृति और राजनीति—तीनों को एक-दूसरे से अलग नहीं करता। सर्वेश्वर के यहाँ प्रेम निजी होकर भी सामाजिक है और प्रकृति सुंदर होकर भी संघर्षशील। उनकी कविता में नदी, पेड़, हवा, धूप और चाँद महज सजावटी बिंब नहीं, बल्कि जीवन की गतिशील शक्तियाँ हैं। प्रकृति के माध्यम से वे मनुष्य की स्वतंत्रता और जीवन-आकांक्षा को समझते हैं। दूसरी ओर, राजनीतिक कविता लिखते हुए वे नारेबाजी के शिकार नहीं होते। उनका व्यंग्य तीखा है, लेकिन उसमें मनुष्य के प्रति करुणा बनी रहती है। वे व्यवस्था की आलोचना करते हैं, पर मनुष्य से आशा नहीं छोड़ते। उनकी कविता में अँधेरा जितना गहरा है, प्रकाश की आकांक्षा भी उतनी ही प्रबल है। इसीलिए सर्वेश्वर की रचनाएँ निराशा में भी प्रतिरोध की संभावना बचाए रखती हैं।
5.सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का नाटक **‘बकरी’** उनके रचनात्मक कृति-कर्म का अत्यंत महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। यह नाटक सत्ता, राजनीति और जनमानस के संबंधों पर तीखा व्यंग्य करता है। बकरी यहाँ केवल एक पशु नहीं, बल्कि उस साधारण जनता का प्रतीक है जिसे सत्ता अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करती है। राजनीतिक शक्तियाँ जनता की भावनाओं, आस्थाओं और भय को अपने पक्ष में मोड़ती हैं—‘बकरी’ इसी प्रक्रिया का नाटकीय उद्घाटन करता है। नाटक की भाषा सहज, संवादधर्मी और मंचीय है, लेकिन उसके भीतर गहरी राजनीतिक दृष्टि काम करती है। सर्वेश्वर यह दिखाते हैं कि जब जनता विवेक खो देती है, तब सत्ता उसके जीवन की छोटी-से-छोटी वस्तु को भी प्रतीक, हथियार और तमाशा बना सकती है। आज के समय में भी ‘बकरी’ इसलिए प्रासंगिक है कि जनतंत्र में नागरिक चेतना की रक्षा निरंतर आवश्यक है।
6.पत्रकार और संपादक के रूप में भी सर्वेश्वर का योगदान उल्लेखनीय है। ‘दिनमान’ और ‘पराग’ से जुड़े रहते हुए उन्होंने साहित्य, पत्रकारिता और सामाजिक चेतना के बीच एक जीवंत सेतु निर्मित किया। वे मानते थे कि पत्रकारिता केवल घटनाओं की सूचना देना नहीं, बल्कि समाज के भीतर छिपे सत्य को सामने लाना भी है। बाल-पत्रिका ‘पराग’ के संपादन में उन्होंने बच्चों को उपदेश देने के बजाय उनकी कल्पना, जिज्ञासा और स्वाधीन सोच को महत्व दिया। इसीलिए उनका बाल-साहित्य भी उनके समूचे कृति-कर्म की तरह मानवीय और सृजनात्मक है। उन्होंने बच्चों को छोटी उम्र का अधूरा मनुष्य नहीं माना, बल्कि स्वतंत्र अनुभव और कल्पना वाले व्यक्तित्व के रूप में देखा। यह दृष्टि आज भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि बाल-साहित्य किसी समाज के भविष्य की संवेदना तैयार करता है।
7.सर्वेश्वर की रचनाशीलता का सबसे बड़ा गुण है—सत्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता। वे किसी विचारधारा के यांत्रिक प्रचारक नहीं, बल्कि जीवन के सजग व्याख्याकार थे। उनकी कविता में व्यंग्य है, पर कटुता नहीं; करुणा है, पर दीनता नहीं; स्वप्न है, पर पलायन नहीं। वे जानते थे कि समाज बदलना केवल घोषणाओं से संभव नहीं, इसके लिए मनुष्य के भीतर नैतिक साहस और संवेदना का जागना आवश्यक है। उनकी पंक्ति—“दुख तुम्हें दूर तक ले जाएगा”—दुख को निष्क्रिय पीड़ा नहीं, बल्कि आत्मबोध और संघर्ष की शक्ति में बदल देती है। यही कारण है कि सर्वेश्वर का साहित्य पाठक को केवल प्रभावित नहीं करता, उसे अपने समय के प्रति जवाबदेह भी बनाता है। उनकी रचनाएँ हमें सिखाती हैं कि कविता का वास्तविक सौंदर्य उसकी सामाजिक उपयोगिता और मानवीय गहराई में निहित है।
8. सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का निधन 23 सितंबर 1983 को हुआ, लेकिन उनका साहित्य आज भी हमारे बीच सक्रिय संवाद की तरह उपस्थित है। वे उन रचनाकारों में हैं जिनकी प्रासंगिकता समय बीतने के साथ कम नहीं होती, बल्कि नए संदर्भों में और स्पष्ट होती जाती है। आज जब मीडिया, राजनीति और जनमत के बीच संबंध अधिक जटिल हो गए हैं; जब साधारण मनुष्य फिर से असुरक्षा, असमानता और भ्रम से घिरा है; तब सर्वेश्वर की कविता और ‘बकरी’ जैसे नाटक हमें सजग नागरिक बनने का आह्वान करते हैं। उनकी जन्मतिथि पर उन्हें याद करना केवल एक साहित्यकार को श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उस मानवीय विवेक को पुनः स्मरण करना है जिसकी रक्षा उन्होंने जीवनभर की। सर्वेश्वर की कविता जैसे धीमे स्वर में कहती है—अँधेरा चाहे जितना हो, मनुष्य की आँख में बची हुई रोशनी को बचाए रखना ही सच्ची रचना और सच्चा प्रतिरोध है।
©अजय पोद्दार 'अनमोल'