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भारत में 'प्रोजेक्ट चीता' के 4 साल और चीतों की बढ़ती संख्या

17 सितंबर 2022 को कुनो नेशनल पार्क में नामीबिया से लाए गए चीतों के साथ शुरू हुआ 'प्रोजेक्ट चीता' अपने चार वर्ष पूरे कर चुका है। सितंबर 2026 की समीक्षा रिपोर्ट के अनुसार, भारत में चीतों की कुल संख्या बढ़कर 52 हो गई है।

कल्ट करंट डेस्क
कल्ट करंट डेस्क
23 Sep 2026
Solar farm during sunset

17 सितंबर 2022 को कुनो नेशनल पार्क में नामीबिया से लाए गए चीतों के साथ शुरू हुआ 'प्रोजेक्ट चीता' अपने चार वर्ष पूरे कर चुका है। सितंबर 2026 की समीक्षा रिपोर्ट के अनुसार, भारत में चीतों की कुल संख्या बढ़कर 52 हो गई है। यह आंकड़ा अंतर-महाद्वीपीय वन्यजीव पुनर्स्थापन (Intercontinental Wildlife Translocation) के इतिहास में भारत के लिए एक बड़ी और ऐतिहासिक उपलब्धि माना जा रहा है।

इस सफलता की सबसे खूबसूरत और महत्वपूर्ण बात यह है कि कुल 52 चीतों में से 32 शावकों का जन्म भारत की धरती पर हुआ है। शुरुआती चरण में अत्यधिक तापमान और संक्रमण के कारण कुछ चीतों की मौत के बाद जो संशय के बादल मंडरा रहे थे, उन्हें भारतीय वातावरण में ढल चुके इन चीतों और उनकी सफल ब्रीडिंग ने पूरी तरह से छांट दिया है।

प्रजाति के लंबे समय तक अस्तित्व को सुनिश्चित करने के लिए आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity) अत्यंत आवश्यक होती है। नामीबिया (8) और दक्षिण अफ्रीका (12) के बाद 2026 में बोत्सवाना से लाए गए 9 अतिरिक्त चीतों ने इस जेनेटिक पूल को और समृद्ध किया है। वर्तमान में 49 चीते कुनो नेशनल पार्क में सुरक्षित हैं, जबकि 3 चीतों को मंदसौर के गांधी सागर अभयारण्य में सफलतापूर्वक स्थानांतरित कर दिया गया है।

चीता, जो घास के मैदानों (Grasslands) और खुले जंगलों का शीर्ष शिकारी है, के लौटने से भारतीय घास के मैदानों का पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) पुनर्जीवित हो रहा है। इसके साथ ही, श्योपुर और मंदसौर जैसे पिछड़े और ग्रामीण इलाकों में इको-टूरिज्म को अभूतपूर्व बढ़ावा मिला है, जिससे स्थानीय समुदायों के लिए रोजगार और आजीविका के नए रास्ते खुले हैं।

हालांकि सफलता उत्साहजनक है, लेकिन भविष्य में वयस्क चीतों के बीच क्षेत्रीय संघर्ष (Territorial Fights) को रोकना, मानव-वन्यजीव संघर्ष से बचाव करना और उनके लिए वन्यजीव गलियारे (Wildlife Corridors) विकसित करना सबसे बड़ी चुनौतियां होंगी। यह परियोजना वैश्विक स्तर पर विलुप्त हो रही प्रजातियों के संरक्षण और उनके प्राकृतिक पुनर्वास का एक विश्वस्तरीय आदर्श बन चुकी है।