मध्य एशियाई देश कजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान के बीच ऊर्जा गलियारों और पार-क्षेत्रीय व्यापारिक मार्गों को लेकर एक नया कूटनीतिक और आर्थिक गतिरोध पैदा हो गया है। क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने के लिए वैश्विक महाशक्तियों की कूटनीति ने इस भूमि से घिरे (Landlocked) क्षेत्र को भू-राजनीतिक संघर्ष का नया अखाड़ा बना दिया है।
क्षेत्रीय स्थिरता को बनाए रखने के लिए मध्य एशियाई गणराज्यों के विदेश मंत्रियों ने एक आपातकालीन शिखर सम्मेलन आयोजित किया है। इस बैठक में विदेशी हस्तक्षेप को रोकने और आपसी व्यापारिक समझौतों को बिना किसी बाहरी दबाव के आगे बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया है।
रूस, चीन और पश्चिमी देशों के बीच मध्य एशिया के विशाल खनिज भंडारों और यूरेनियम आपूर्ति पर नियंत्रण पाने के लिए कूटनीतिक दांव-पेंच तेज हो चुके हैं। प्रत्येक महाशक्ति इस क्षेत्र के देशों को अपने पाले में खींचने के लिए भारी आर्थिक पैकेज और रक्षा सौदों की पेशकश कर रही है।
इस कूटनीतिक उथल-पुथल से मध्य एशिया की आंतरिक राजनीति में अस्थिरता के संकेत मिलने लगे हैं, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा एजेंसियों को सीमाओं पर आतंकवाद और तस्करी रोकने के लिए विशेष अभियान चलाने पड़ रहे हैं।
भारतीय परिप्रेक्ष्य: मध्य Asia भारत के 'विस्तृत पड़ोस' (Extended Neighbourhood) का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत की 'कनेक्टिविटी' और ऊर्जा सुरक्षा (विशेषकर यूरेनियम आयात) के लिए कजाकिस्तान और अन्य मध्य एशियाई देश बेहद अहम हैं। भारत 'इंस्ट इंटरनेशनल नॉर्थ-दक्षिण ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर' (INSTC) के माध्यम से इस क्षेत्र के साथ अपने व्यापारिक और रणनीतिक संबंधों को मजबूत करने की दिशा में तेजी से काम कर रहा है।
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