भारतीय संस्कृति, दार्शनिक विरासत और वैश्विक सभ्यतागत जुड़ाव से जुड़ी आज की सबसे प्रमुख खबर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के हैदराबाद हाउस और संस्कृति मंत्रालय से आ रही है। संस्कृति मंत्रालय और भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) के तत्वावधान में आयोजित "वैश्विक सांस्कृतिक संबंध और साझा धरोहर" पर तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय महासम्मेलन आज भव्य समापन के साथ संपन्न हुआ।
इस वैश्विक सम्मेलन में भारत, जापान, नेपाल, ईरान, मंगोलिया, श्रीलंका और मध्य एशियाई देशों के 200 से अधिक शीर्ष सांस्कृतिक विद्वानों, इतिहासकारों और पुरातत्वविदों ने भाग लिया। सम्मेलन का मुख्य केंद्र बिंदु बौद्ध दर्शन, प्राचीन सिल्क रूट व्यापारिक मार्गों और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के वैश्विक प्रसार पर विस्तृत शोध साझा करना था।
भारतीय सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में इस सम्मेलन के जरिए भारत ने 'ग्लोबल साउथ' (Global South) और एशियाई पड़ोसी देशों में अपनी 'सॉफ्ट पावर' (Soft Power) और प्राचीन जीवन-दर्शन 'वसुधैव कुटुंबकम' (पूरा विश्व एक परिवार है) की भावना को कूटनीतिक पटल पर फिर से स्थापित किया है।
कूटनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आज की दुनिया जहाँ सैन्य तनावों और आर्थिक होड़ से जूझ रही है, वहीं भारत की यह सांस्कृतिक कूटनीति दुनिया को शांति, सह-अस्तित्व और नैतिक मूल्यों का एक नया मार्ग दिखा रही है। प्राचीन धरोहरों और साझा सांस्कृतिक जड़ों का यह पुनर्निर्माण देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को गहरा बना रहा है।
इसके साथ ही, सम्मेलन में भारत की प्राचीन योग परंपरा, आयुर्वेद, हस्तशिल्प और संगीत-कला को वैश्विक पर्यटन और सांस्कृतिक विनिमय कार्यक्रमों से जोड़ने के लिए कई द्विपक्षीय समझौतों पर भी हस्ताक्षर किए गए।
यह गौरवशाली सांस्कृतिक महासम्मेलन यह स्पष्ट करता है कि वैश्विक मंच पर भारत का बढ़ता कद केवल आर्थिक या सैन्य ताकत पर आधारित नहीं है, बल्कि हमारी अमूर्त सांस्कृतिक विरासत दुनिया को एकजुट करने वाली सबसे बड़ी शक्ति बनी हुई है।
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