मध्य पूर्व (Middle East) में तनाव एक बार फिर अपने चरम पर पहुंच गया है। यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब के बुनियादी ढांचों और ऊर्जा प्रतिष्ठानों को निशाना बनाकर किए गए ड्रोन और मिसाइल हमलों के बाद, रियाद ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए वैश्विक शक्तियों से तत्काल सहायता मांगी है। सऊदी सरकार ने फ्रांस, ब्रिटेन और पाकिस्तान से अपने हवाई रक्षा क्षेत्र (Air Defence) को मजबूत करने और खुफिया जानकारी साझा करने के लिए त्वरित सैन्य सहयोग का अनुरोध किया है।
पिछले कुछ हफ्तों में रेड सी (लाल सागर) और अदन की खाड़ी में वाणिज्यिक जहाजों पर हूती हमलों ने वैश्विक व्यापार मार्ग को बुरी तरह प्रभावित किया था, लेकिन अब इन विद्रोहियों ने सीधे सऊदी अरब की सीमा के भीतर महत्वपूर्ण तेल रिफाइनरियों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। यमन संकट का यह नया चरण न केवल खाड़ी देशों की सुरक्षा को खतरे में डालता है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला के लिए भी एक बड़ा खतरा पैदा कर रहा है, जिससे दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतों में अचानक उछाल आया है।
सऊदी अरब द्वारा फ्रांस और ब्रिटेन जैसे पश्चिमी देशों के साथ-साथ पाकिस्तान से मदद मांगना उसकी बहु-स्तरीय सुरक्षा नीति को दर्शाता है। जहां पश्चिमी देशों के पास आधुनिक 'पैट्रियट' और अन्य उन्नत एंटी-मिसाइल डिफेंस सिस्टम हैं, वहीं पाकिस्तान के साथ सऊदी अरब के पुराने और मजबूत सैन्य संबंध रहे हैं, जिसके तहत पाकिस्तानी थल सेना के दस्ते पहले भी सऊदी सीमाओं की सुरक्षा में तैनात रहे हैं। रियाद अपने रक्षा तंत्र को किसी भी बड़े हमले से पहले अभेद्य बनाना चाहता है।
इस संकट का असर केवल खाड़ी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत जैसे ऊर्जा-आयातक देशों पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ेगा। लाल सागर मार्ग प्रभावित होने से जहाजों का किराया और बीमा प्रीमियम बढ़ जाता है, जिससे आयात-निर्यात काफी महंगा हो जाता है। इसके अलावा, खाड़ी देशों में रहने वाले लाखों भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा को लेकर भी भारत सरकार की पैनी नजर इस पूरे घटनाक्रम पर बनी हुई है।
संक्षेप में, यमन-सऊदी संघर्ष का यह नया मोड़ मध्य पूर्व को एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध की ओर धकेलने की क्षमता रखता है। यदि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने कूटनीतिक रास्तों और रक्षात्मक सहयोग के जरिए हूती विद्रोहियों के इन हमलों को तुरंत नहीं रोका, तो इसके गंभीर परिणाम केवल खाड़ी तक सीमित न रहकर पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को मंदी और ऊर्जा संकट की ओर ढकेल सकते हैं।