नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन का सफल समापन 'नई दिल्ली घोषणापत्र 2026' के सर्वसम्मति से पारित होने के साथ हुआ। इस ऐतिहासिक घोषणापत्र में वैश्विक शांति, सुरक्षा और आर्थिक पुनरुद्धार के लिए कई क्रांतिकारी प्रस्तावों पर मुहर लगाई गई है। वर्तमान समय में, जब पूरी दुनिया आर्थिक अनिश्चितताओं, क्षेत्रीय संघर्षों और भू-राजनीतिक तनावों से जूझ रही है, तब ब्रिक्स देशों का एक साझा मंच पर आकर इतनी बड़ी आम सहमति बनाना भारत के कुशल कूटनीतिक नेतृत्व को दर्शाता है। यह घोषणापत्र केवल एक औपचारिक दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन का एक मजबूत प्रतीक बनकर उभरा है।
इस सम्मेलन और घोषणापत्र का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु आतंकवाद के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' (शून्य सहनशीलता) नीति को वैश्विक स्तर पर कड़ाई से लागू करने का संकल्प रहा है। ब्रिक्स सदस्य देशों ने वैश्विक शांति के लिए खतरा बनी आतंकी गतिविधियों की कड़े शब्दों में निंदा की और आतंकवाद के वित्तपोषण तथा उनके सुरक्षित ठिकानों को पूरी तरह समाप्त करने की प्रतिबद्धता जताई। इसके साथ ही, घोषणापत्र में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय तंत्रों (जैसे आईएमएफ और विश्व बैंक) में समयबद्ध सुधार की मांग को मजबूती से दोहराया गया, जिसे संयुक्त राष्ट्र के शीर्ष नेतृत्व का भी समर्थन मिला है।
आर्थिक और तकनीकी मोर्चे पर भी नई दिल्ली घोषणापत्र ने कई ठोस रणनीतिक कदम उठाए हैं। सदस्य देशों ने आपसी व्यापार को सुगम बनाने के लिए अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने और अपनी स्थानीय मुद्राओं के उपयोग को प्राथमिकता देने पर सहमति व्यक्त की है। इसके अतिरिक्त, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) को बाह्य झटकों से सुरक्षित रखने, खाद्य सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिए नए व्यापारिक ढांचों का निर्माण करने और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए नई हरित पहलों को शुरू करने पर बल दिया गया। यह समझौता विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था को एक नई सुरक्षा और गति प्रदान करेगा।
डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे (DPI) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के सुरक्षित उपयोग को लेकर भी सम्मेलन में व्यापक विचार-विमर्श हुआ। भारत ने अपने सफल डिजिटल मॉडल को दुनिया के सामने रखते हुए तकनीक के न्यायसंगत वितरण और महत्वपूर्ण खनिजों तथा तकनीक के 'हथियारीकरण' (Weaponisation) को रोकने का आह्वान किया। सभी सदस्य देश इस बात पर सहमत हुए कि उभरती तकनीकों का लाभ केवल कुछ विकसित देशों तक सीमित रहने के बजाय पूरे वैश्विक समुदाय को मिलना चाहिए ताकि समावेशी विकास का सपना साकार हो सके।
संक्षेप में, यह सम्मेलन और नई दिल्ली घोषणापत्र इस बात का प्रमाण है कि भारत अब अंतरराष्ट्रीय राजनीति में केवल एक दर्शक नहीं, बल्कि एजेंडा तय करने वाला मुख्य रणनीतिकार बन चुका है। भारत ने ग्लोबल साउथ (विकासशील और गरीब देशों) की चिंताओं को विश्व के शीर्ष मंच पर रखकर यह साबित कर दिया है कि वह एक जिम्मेदार और प्रभावकारी मध्यस्थ है। आने वाले वर्षों में यह घोषणापत्र बहुपक्षीय वैश्विक व्यवस्था को अधिक संतुलित, निष्पक्ष और न्यायसंगत बनाने में एक मील का पत्थर साबित होगा।