ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के साथ नए सदस्य देशों के समावेश के बाद आयोजित ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इस बार का सम्मेलन केवल पारंपरिक आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने एक नई बहुध्रुवीय (Multipolar) विश्व व्यवस्था की नींव को और मजबूत किया है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, जलवायु परिवर्तन और पश्चिमी देशों के एकतरफा वर्चस्व के बीच यह बैठक ग्लोबल साउथ के देशों के लिए अपनी आवाज बुलंद करने का सबसे प्रभावी मंच बनकर उभरी है।
सम्मेलन के दौरान सर्वसम्मति से स्वीकार किए गए घोषणापत्र में द्विपक्षीय और बहुपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देने पर सबसे अधिक बल दिया गया। इसके तहत सदस्य देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं (Local Currencies) में व्यापार करने की नीति को और आगे बढ़ाया गया है, जिससे अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम की जा सके। इसके अतिरिक्त, 'न्यू डेवलपमेंट बैंक' (NDB) के माध्यम से विकासशील देशों में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए बिना किसी कठिन राजनीतिक शर्तों के ऋण उपलब्ध कराने की व्यवस्था को गति दी जा रही है।
भारत की कूटनीतिक भूमिका इस सम्मेलन में बेहद संतुलित और निर्णायक रही। भारत ने एक तरफ जहां विकासशील देशों के हितों, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की वकालत की, वहीं दूसरी तरफ किसी भी तरह के "पश्चिम-विरोधी" गुट का हिस्सा बनने के बजाय "गैर-पश्चिम" (Non-Western) तटस्थ मंच बनाए रखने की नीति पर जोर दिया। भारत का यह रुख ब्रिक्स को केवल एक राजनीतिक मोर्चेबंदी से बचाकर एक सकारात्मक और विकासात्मक आर्थिक मंच के रूप में स्थापित करता है।
वैश्विक शासन संरचना (Global Governance) में सुधार इस सम्मेलन की दूसरी सबसे बड़ी मांग रही। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC), अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक जैसी पुरानी संस्थाओं में समकालीन वास्तविकताओं के अनुसार बदलाव न होने पर चिंता व्यक्त की गई। ब्रिक्स देशों का मानना है कि 21वीं सदी की चुनौतियों का सामना 20वीं सदी के पुराने नियमों और संस्थाओं से नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि अफ्रीकी और एशियाई देशों की भागीदारी बढ़ाने पर विस्तृत चर्चा हुई।
निष्कर्षतः, ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था का केंद्र अब पूर्व और दक्षिण की ओर खिसक रहा है। भारत जैसे देश अपनी तकनीकी दक्षता, विशाल बाजार और कूटनीतिक परिपक्वता के बल पर इस नए शक्ति संतुलन के केंद्र में हैं। सम्मेलन के फैसले आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और राजनयिक संबंधों की नई दिशा तय करेंगे।