महाराष्ट्र सरकार द्वारा समान नागरिक संहिता (UCC - Uniform Civil Code) का मसौदा तैयार करने के लिए गठित उच्च स्तरीय समिति से एक बड़ी खबर सामने आई है। इस पैनल के एक प्रमुख सदस्य और पूर्व न्यायमूर्ति आरसी चव्हाण ने अचानक अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। इस इस्तीफे ने न केवल राज्य के प्रशासनिक और कानूनी हलकों में खलबली मचा दी है, बल्कि यूसीसी को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रही राज्य सरकार के सामने एक बड़ा राजनीतिक व प्रक्रियात्मक संकट खड़ा कर दिया है।
हालांकि न्यायमूर्ति चव्हाण के इस्तीफे के आधिकारिक कारणों को लेकर विभिन्न कयास लगाए जा रहे हैं, लेकिन सूत्रों और विशेषज्ञों का मानना है कि पैनल के काम करने के तरीके, समय-सीमा या मसौदे के कुछ संवेदनशील कानूनी प्रावधानों को लेकर वैचारिक मतभेद हो सकते हैं। यूसीसी जैसे जटिल विषय पर काम करते समय विभिन्न धर्मों, जनजातियों और व्यक्तिगत कानूनों (Personal Laws) के बीच संतुलन बनाना बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य होता है। ऐसे में कानूनी विशेषज्ञों और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच दृष्टिकोण का अंतर इस तरह के फैसलों की वजह बन जाता है।
उत्तराखंड के बाद महाराष्ट्र देश का ऐसा राज्य बनने की दिशा में कदम बढ़ा रहा था जो अपने यहां समान नागरिक संहिता लागू करने का खाका तैयार कर रहा है। यूसीसी का उद्देश्य विवाह, तलाक, गोद लेने, उत्तराधिकार और संपत्ति के अधिकारों जैसे मामलों में सभी नागरिकों के लिए, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो, एक समान कानून बनाना है। हालांकि, महाराष्ट्र की समृद्ध विविधता, विशाल जनजातीय आबादी और विभिन्न धार्मिक समुदायों की अपनी परंपराओं के कारण इसे लागू करना बेहद जटिल काम है। ऐसे में किसी वरिष्ठ कानूनी विशेषज्ञ का हटना पैनल की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है।
पूर्व जज के इस्तीफे को विपक्ष ने एक बड़े हथियार के रूप में थाम लिया है। विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार बिना पर्याप्त तैयारी, व्यापक परामर्श और कानूनी बारीकियों को समझे बिना जल्दबाजी में राजनीतिक लाभ के लिए यूसीसी को थोपना चाहती है। विपक्ष का तर्क है कि जब समिति के अपने ही सदस्य प्रक्रिया से संतुष्ट नहीं हैं, तो यह संहिता सर्वसमावेशी कैसे हो सकती है। इस घटनाक्रम के बाद राज्य में यूसीसी के क्रियान्वयन पर सवालिया निशान लग गए हैं और सरकार रक्षात्मक मुद्रा में आ गई है।
न्यायमूर्ति चव्हाण का इस्तीफा महाराष्ट्र सरकार के लिए एक बड़ा सबक है कि यूसीसी जैसे दूरगामी और संवेदनशील विषय पर जल्दबाजी के बजाय सर्वसम्मति और गहन कानूनी अध्ययन की आवश्यकता है। सरकार को अब न केवल पैनल में खाली पड़े स्थान को किसी योग्य कानूनी विशेषज्ञ से भरना होगा, बल्कि समिति के काम में पारदर्शिता और सभी वर्गों के विश्वास को बहाल करना होगा। यदि सरकार बिना सभी पक्षों को संतुष्ट किए आगे बढ़ती है, तो आने वाले समय में यह मामला अदालत की चौखट तक पहुंच सकता है और कानूनी अड़चनों में उलझ सकता है।