यूरोप की सीमाई सीमाओं पर आज एक ऐसा मानवीय और दर्दनाक नजारा देखने को मिला जिसने पूरी दुनिया की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है। मध्य पूर्व, उत्तर अफ्रीका और युद्धग्रस्त क्षेत्रों से भागे हजारों शरणार्थियों के जत्थे भूमध्य सागर के रास्ते और स्थल सीमाओं पर यूरोपीय देशों में दाखिल होने की कोशिश कर रहे हैं। यूनान, इटली और पोलैंड की सीमाओं पर सीमा सुरक्षा बलों और इन बेबस शरणार्थियों के बीच तीखी झड़पें हुई हैं, जिसके बाद कई यूरोपीय राष्ट्रों ने अपनी सीमाओं को पूरी तरह सील करते हुए आपातकाल की घोषणा कर दी है।
यूरोपीय संघ (EU) के भीतर इस मानवीय संकट को लेकर भयंकर राजनीतिक विभाजन और अंतर्कलह शुरू हो गई है। एक तरफ जहां इटली और ग्रीस जैसे सीमावर्ती देश यह शिकायत कर रहे हैं कि वे अकेले लाखों शरणार्थियों का बोझ नहीं उठा सकते, वहीं दूसरी तरफ पूर्वी यूरोप के कई देश इन शरणार्थियों को अपने यहां शरण देने से साफ मना कर रहे हैं। ब्रसेल्स में बुलाई गई आपातकालीन बैठकों में नेताओं के बीच तीखी बहसें हो रही हैं, लेकिन धरातल पर कोई सर्वसम्मत या मानवीय समाधान निकलता हुआ नजर नहीं आ रहा है।
सीमाओं पर फंसे इन हजारों लोगों का जीवन पूरी तरह नर्क में तब्दील हो चुका है। कपकपाती ठंड और खुले आसमान के नीचे बिना भोजन, पानी और चिकित्सा सुविधाओं के सड़ रहे इन परिवारों में मासूम बच्चे और गर्भवती महिलाएं भी शामिल हैं। कंटीले तारों की बाड़ के पीछे से अपने हक की भीख मांगते इन इंसानों पर जब सुरक्षा बल आंसू गैस के गोले और पानी की बौछारें छोड़ते हैं, तो मानवाधिकारों के तमाम दावों की कलई पूरी तरह से खुल जाती है।
एक संवेदनशील इंसान की नजर से देखें तो यह त्रासदी उस वैश्विक व्यवस्था की सबसे क्रूर असफलता है जो इंसानों को केवल 'अवैध घुसपैठियों' के आंकड़ों के रूप में देखती है। कोई भी इंसान अपनी इच्छा से अपना घर, देश और अपनी जड़ें छोड़कर मौत के इस अनजान सफर पर नहीं निकलता। जब युद्ध, भुखमरी और हिंसा उनके अपने देशों को तबाह कर देती है, तब जान बचाने की आखिरी कोशिश में वे इन खतरनाक रास्तों को चुनते हैं। उनके इस दर्द को ठुकराना मानवता के पतन की पराकाष्ठा है।
भारत के लिए यह अंतरराष्ट्रीय संकट एक बड़ा कूटनीतिक और मानवीय सबक है। भारत ने इतिहास में हमेशा से ही संकटग्रस्त और पीड़ित लोगों को शरण दी है और अपनी सीमाओं की सुरक्षा के साथ-साथ मानवीय मूल्यों का संतुलन बनाए रखा है। यूरोपीय संघ की यह असफलता भारत को यह सिखाती है कि क्षेत्रीय अस्थिरता और युद्ध का असर केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह बहुत बड़े मानवीय विस्थापन का कारण बनता है। भारत हमेशा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर युद्ध और अशांति को रोककर उनके गृह देशों में शांति बहाल करने की वकालत करता रहा है।
यह शरणार्थी संकट पूरी दुनिया को यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि क्या हम एक ऐसा समाज बना रहे हैं जहां नक्शों पर खींची गई रेखाएं इंसान की जान से ज्यादा कीमती हो गई हैं। अगर अमीर और विकसित देश युद्धों को रोकने और गरीब देशों में स्थिरता लाने के लिए अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाएंगे, तो यह मानवीय विस्थापन का तूफान उनकी अपनी सीमाओं के दरवाजे भी तोड़ता रहेगा। इस त्रासदी का हल बंदूक और कंटीले तारों में नहीं, बल्कि वैश्विक करुणा और न्यायपूर्ण नीतियों में छिपा है।
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