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दक्षिण चीन सागर: सीधा टकराव?

दक्षिण चीन सागर में चीन की आक्रामक सैन्य गतिविधियों ने एक बार फिर पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र को युद्ध के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। बीजिंग की नौसेना ने अपने पड़ोसियों के समुद्री क्षेत्रों में अवैध घुसपैठ और उन्नत रडार सिस्टम तैनात करके अपनी दबंगई बढ़ा दी है।

कल्ट करंट डेस्क
कल्ट करंट डेस्क
08 Oct 2026
Solar farm during sunset

दक्षिण चीन सागर में चीन की आक्रामक सैन्य गतिविधियों ने एक बार फिर पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र को युद्ध के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। बीजिंग की नौसेना ने अपने पड़ोसियों के समुद्री क्षेत्रों में अवैध घुसपैठ और उन्नत रडार सिस्टम तैनात करके अपनी दबंगई बढ़ा दी है। जवाब में अमेरिका, फिलीपींस और उनके सहयोगियों ने साझा नौसैनिक युद्धाभ्यास शुरू कर दिया है। ड्रैगन के फाइटर जेट्स और तटरक्षक जहाजों द्वारा किए जा रहे खतरनाक पैंतरों के कारण इस इलाके में किसी भी समय सैन्य टकराव की चिंगारी भड़क सकती है। अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों पर चीन का एकाधिकार स्थापित करने का यह प्रयास अब बाकी दुनिया के लिए बर्दाश्त से बाहर हो रहा है।

अमेरिका ने साफ कर दिया है कि वह अपने सहयोगियों की रक्षा के लिए इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी को और मजबूत करेगा। अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के 'ऑकस' (AUKUS) समझौते के तहत इस इलाके में परमाणु पनडुब्बियों की तैनाती में तेजी लाई जा रही है। चीन इसे अपने खिलाफ एक बड़े घेराबंदी के रूप में देख रहा है और उसने जवाबी कार्रवाई की धमकी दी है। इस टकराव से स्पष्ट है कि महाशक्तियों की यह जंग अब सिर्फ बयानों तक सीमित नहीं रही, बल्कि समुद्र की लहरों पर मिसाइलों और जंगी जहाजों के जरिए सीधे आक्रामक मोड में आ चुकी है।

भारत के लिए दक्षिण चीन सागर कोई दूर-दराज का इलाका नहीं है, बल्कि यह देश के व्यापारिक हितों की रीढ़ है। भारत का लगभग 55% से अधिक समुद्री व्यापार इसी जलमार्ग से होकर गुजरता है। यदि चीन इस इलाके में पूर्ण नियंत्रण हासिल कर लेता है, तो भारत के वैश्विक व्यापार पर इसका सीधा और बेहद नकारात्मक असर पड़ेगा। जहाजों के रास्तों में बदलाव या अतिरिक्त टैक्स के कारण भारतीय कंपनियों की व्यापारिक लागत बढ़ जाएगी, जिससे देश की अर्थव्यवस्था पर दबाव बनेगा। इसके अलावा, भारत की 'एक्ट ईस्ट' नीति के तहत वियतनाम, फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे देशों के साथ बने संबंध भी चीन की इस आक्रामकता के कारण प्रभावित हो सकते हैं।

कूटनीतिक रूप से, भारत ने हमेशा 'फ्री, ओपन और इनक्लूसिव इंडो-पैसिफिक' का समर्थन किया है। भारत का स्पष्ट मानना है कि अंतरराष्ट्रीय समुद्र में नौवहन की स्वतंत्रता (Freedom of Navigation) सभी देशों का अधिकार है। इस रणनीति के तहत भारत ने 'क्वाड' (Quad) गठबंधन के जरिए अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर इंडो-पैसिफिक में सुरक्षा संतुलन बनाए रखने के प्रयास तेज कर दिए हैं। हाल ही में भारत ने फिलीपींस को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलें सौंपकर यह साफ संदेश दिया है कि वह चीन के खिलाफ क्षेत्र के छोटे देशों को मजबूत करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने से भारत के ऊर्जा सुरक्षा हितों पर भी आंच आ रही है। भारत की सरकारी तेल कंपनी ONGC वियतनाम के समुद्री क्षेत्र में तेल और गैस की खोज में लगी हुई है, जिस पर चीन लगातार अपना मालिकाना हक जताता रहा है और भारतीय जहाजों को डराने की कोशिश करता आया है। भारत ने चीन के इन दबावों को पूरी तरह खारिज करते हुए अपनी गतिविधियां जारी रखी हैं। भारत का यह रुख दिखाता है कि नई दिल्ली अब बीजिंग की किसी भी दादागिरी को स्वीकार करने के मूड में बिल्कुल नहीं है।

एशिया-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन का यह खेल एक बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुका है। चीन की आक्रामक महत्वाकांक्षाओं और लोकतांत्रिक देशों की एकजुटता के बीच यह लड़ाई सिर्फ सीमाओं की नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय नियमों की रक्षा की बन गई है। भारत इस पूरे वैश्विक मोर्चे पर एक मजबूत, जिम्मेदार और निर्णायक भूमिका निभा रहा है। अगर समय रहते चीन ने अपनी नीति में बदलाव नहीं किया, तो यह समुद्री तनाव पूरे एशिया के आर्थिक भविष्य को अंधकार में धकेल सकता है।

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