यूक्रेन युद्ध ने एक अत्यंत घातक और ऐतिहासिक मोड़ ले लिया है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर ज़ेलेंस्की ने ऐलान किया है कि उनकी सेना ने पूरी तरह से स्वदेशी रूप से विकसित 'FP-7' बैलिस्टिक मिसाइल का पहला सफल कॉम्बैट इस्तेमाल किया है। करीब 200 किलोमीटर की मारक क्षमता वाली इस घातक मिसाइल के इस्तेमाल ने रूसी सीमा के भीतर स्थित लॉजिस्टिक्स और मिसाइल लॉन्च पैड्स में तबाही मचा दी है।
अब तक यूक्रेन अपनी लंबी दूरी की स्ट्राइक के लिए अमेरिका और यूरोपीय देशों (जैसे ATACMS और स्टॉर्म शैडो) की मिसाइलों पर निर्भर था, जिन पर पश्चिमी देश कड़े राजनीतिक प्रतिबंध लगाते थे। लेकिन यूक्रेन की रक्षा कंपनी 'फायर पॉइंट' द्वारा विकसित FP-7 मिसाइल ने कीव को एक नई 'औद्योगिक और सैन्य आत्मनिर्भरता' दे दी है। यूक्रेन अब बिना किसी पश्चिमी इजाजत के रूसी ठिकानों पर हमला करने में सक्षम हो चुका है।
यूक्रेनी रक्षा विशेषज्ञ अब इससे भी अधिक घातक और लंबी दूरी की 'FP-9' मिसाइल प्रणाली पर काम कर रहे हैं। स्वदेशी बैलिस्टिक मिसाइलों के इस अचानक आगमन ने मॉस्को के सैन्य कमान केंद्र को हिलाकर रख दिया है, क्योंकि अब रूस के अंदरूनी हिस्सों पर हमले का खतरा काफी बढ़ गया है, जिससे युद्ध का दायरा और अधिक विनाशकारी होने की आशंका है।
भारत के लिए यूक्रेन का यह मिसाइल विकास एक बहुत महत्वपूर्ण तकनीकी और रणनीतिक संदेश है। युद्ध के इस दौर ने भारत को सिखाया है कि विदेशी हथियारों या विदेशी राजनीति पर निर्भर रहने के बजाय अपनी घरेलू रक्षा विनिर्माण (Domestic Defense Manufacturing) क्षमता को मजबूत करना कितना अनिवार्य है।
भारत अपनी 'प्रलय' (Pralay) और 'अग्नि' जैसी स्वदेशी बैलिस्टिक मिसाइल प्रणालियों को लगातार मजबूत कर रहा है। यूक्रेन में ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलों का जो तालमेल देखा जा रहा है, भारतीय सेना उसका बहुत बारीकी से अध्ययन कर रही है ताकि चीन और पाकिस्तान से लगी अपनी सीमाओं पर अत्याधुनिक मिसाइल डिफेन्स सिस्टम (S-400 और कुशा प्रोजेक्ट) को और मजबूत किया जा सके।
यह घटनाक्रम दिखाता है कि आधुनिक युद्ध में तकनीक का स्वदेशीकरण ही एकमात्र रास्ता है। भारत अपनी तीनों सेनाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में और तेजी से कदम बढ़ा रहा है ताकि किसी भी वैश्विक संकट के समय देश की सीमाएं पूरी तरह अभेद्य रहें।
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