वैश्विक टेक जगत में उस समय भूचाल आ गया जब चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने घोषणा की कि वह आधुनिक चिपमेकिंग और रक्षा उपकरणों में इस्तेमाल होने वाले 'रेयर अर्थ मिनरल्स' (Rare Earth Minerals) और गैलियम-जर्मेनियम जैसे महत्वपूर्ण तत्वों के निर्यात पर कड़े प्रतिबंध लगाने जा रहा है। चीन दुनिया के लगभग 80 प्रतिशत से अधिक रेयर अर्थ प्रोसेसिंग पर एकाधिकार रखता है। चीन के इस अचानक लिए गए फैसले को अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए टेक प्रतिबंधों के खिलाफ एक बड़ा आर्थिक और कूटनीतिक पलटवार माना जा रहा है।
चीन के इस कदम से अमेरिका, यूरोप और जापान के टेक उद्योगों में हड़कंप मच गया है। सेमीकंडक्टर चिप्स, स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक वाहन (EV) की बैटरियों, फाइटर जेट्स और रिन्यूएबल एनर्जी उपकरण बनाने वाली वैश्विक कंपनियों की सप्लाई चेन अचानक ठप होने के कगार पर पहुंच गई है। विश्लेषकों का अनुमान है कि यदि चीन का यह बैन लंबा खींचता है, तो इससे दुनिया भर में इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पाद बेहद महंगे हो जाएंगे और वैश्विक ऑटोमोबाइल व टेक सेक्टर को अरबों डॉलर का नुकसान उठाना पड़ेगा।
पश्चिम के पास इन खनिजों के खनन और सबसे महत्वपूर्ण उनके प्रसंस्करण (Processing) की तत्काल कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है, क्योंकि चीन ने दशकों की मेहनत और रियायती नीतियों के बल पर इस सप्लाई चेन पर पूरा प्रभुत्व जमाया है। वाशिंगटन ने तुरंत इस मुद्दे पर अपने सहयोगियों के साथ एक आपातकालीन बैठक बुलाई है और जी-7 (G7) देश अब चीन पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए 'देर से ही सही' नए आपूर्ति मार्गों की तलाश में जुट गए हैं। इसे 'इकोनॉमिक कोएर्शन' या आर्थिक ब्लैकमेलिंग का नाम दिया जा रहा है।
भारतीय परिपेक्ष्य में, यह चिप और रेयर अर्थ वार भारत के लिए एक बड़ा सबक और साथ ही एक ऐतिहासिक अवसर भी है। भारत अपनी इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग और 'सेमीकंडक्टर मिशन' (India Semiconductor Mission) को तेजी से आगे बढ़ा रहा है। चीन के इस बैन से भारत में बन रहे नए सेमीकंडक्टर प्लांट्स के लिए कच्चे माल की आपूर्ति में अल्पकालिक चुनौतियां आ सकती हैं, लेकिन लंबे समय में यह भारत को खुद का रेयर अर्थ प्रोसेसिंग इकोसिस्टम खड़ा करने के लिए मजबूर करेगा।
भारत सरकार ने इस दिशा में त्वरित कदम उठाते हुए वियतनाम, ऑस्ट्रेलिया, और लैटिन अमेरिकी देशों के साथ 'क्रिटिकल मिनरल्स ब्लॉक' के तहत साझेदारी बढ़ा दी है। इसके अलावा, भारत अपने घरेलू रेयर अर्थ भंडारों के दोहन और निजी क्षेत्र को खनन व प्रोसेसिंग में शामिल करने के लिए अपनी नीतियों में बड़े बदलाव कर रहा है। भारत का लक्ष्य है कि वह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का एक विश्वसनीय विकल्प (China Plus One) बनकर उभरे, जिससे दुनिया चीन के इस एकाधिकार से मुक्त हो सके।
कुल मिलाकर, 21वीं सदी की भू-राजनीति अब केवल तेल पर नहीं, बल्कि 'चिप्स और खनिजों' पर लड़ी जा रही है। चीन का यह नया दांव वैश्विक अर्थव्यवस्था को गहरे संकट में डाल सकता है। भारत को इस टेक-वॉर के झटकों से अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था को बचाते हुए आत्मनिर्भर बनने की दिशा में और तेजी से कदम बढ़ाने होंगे ताकि भविष्य में किसी भी देश का एकाधिकार भारत की प्रगति को न रोक सके।
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