धरती की सीमाओं को लांघकर अब महाशक्तियों का युद्ध अंतरिक्ष की कक्षाओं (Space Orbits) में पहुंच चुका है। अमेरिकी अंतरिक्ष कमान ने दावा किया है कि रूस और चीन ने संयुक्त रूप से एक ऐसी लेजर-गाइडेड एंटी-सैटेलाइट मिसाइल का सफल परीक्षण किया है, जो निचली कक्षा में तैर रहे पश्चिमी संचार और जासूसी उपग्रहों को चुटकी में अंधा कर सकती है। इस परीक्षण के तुरंत बाद वाशिंगटन ने अंतरिक्ष में अपनी रक्षात्मक मिसाइल प्रणाली तैनात करने के लिए 'आपातकालीन स्पेस कोड' लागू कर दिया है।
अंतर्राष्ट्रीय एयरोस्पेस एजेंसियों की रिपोर्टों के अनुसार, इस गुप्त परीक्षण के कारण अंतरिक्ष में हजारों टुकड़ों का खतरनाक मलबा (Space Debris) जमा हो गया है। यह मलबा अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) और वाणिज्यिक उपग्रहों के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है। रूस ने अमेरिका के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि यह उसका नियमित वैज्ञानिक परीक्षण था, लेकिन सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह भविष्य के 'स्टार वॉर्स' की सीधी आहट है, जहाँ मिसाइलें धरती से नहीं बल्कि अंतरिक्ष से दागी जाएंगी।
इस 'स्पेस वॉर' की होड़ से पूरी दुनिया की डिजिटल संचार प्रणाली पर काले बादल मंडराने लगे हैं। यदि उपग्रहों को निशाना बनाया जाता है, तो जीपीएस, बैंकिंग नेटवर्क, मौसम पूर्वानुमान और दुनिया भर का इंटरनेट सिस्टम पूरी तरह से ठप हो सकता है। आधुनिक युद्धप्रणाली पूरी तरह से सैटेलाइट्स पर निर्भर है, इसलिए जो देश अंतरिक्ष में बढ़त बनाएगा, वही भविष्य के युद्धों का विजेता कहलाएगा।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह घटनाक्रम रणनीतिक और तकनीकी दोनों लिहाज से अत्यधिक महत्वपूर्ण है। भारत ने 2019 में अपने 'मिशन शक्ति' के तहत अपनी एंटी-सैटेलाइट (A-SAT) क्षमता का प्रदर्शन करके दुनिया को अपनी ताकत दिखाई थी। लेकिन रूस और चीन का यह नया गठबंधन अंतरिक्ष में भारत की संपत्तियों के लिए गंभीर चुनौती पैदा कर सकता है। भारत के पास इस समय कृषि, संचार और रक्षा सेवाओं से जुड़े दर्जनों महत्वपूर्ण उपग्रह अंतरिक्ष में सक्रिय हैं।
भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और इसरो (ISRO) अब अपने उपग्रहों की सुरक्षा के लिए 'बॉडीगार्ड सैटेलाइट्स' और लेजर शिल्ड तकनीक विकसित करने पर तेजी से काम कर रहे हैं। भारत को अपने अंतरिक्ष बुनियादी ढांचे को सुरक्षित रखने के लिए अमेरिकी और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसियों के साथ वास्तविक समय में डेटा साझा करने के समझौतों को और मजबूत करना होगा। अंतरिक्ष का यह नया युद्ध क्षेत्र भारत को अपनी 'डिफेंस स्पेस एजेंसी' को और अधिक ताकतवर बनाने के लिए प्रेरित कर रहा है।
निष्कर्षतः, मानवता अब एक ऐसे युग में प्रवेश कर चुकी है जहाँ युद्ध केवल ज़मीन या समुद्र तक सीमित नहीं रहे। यदि अंतरिक्ष में हथियारों की यह होड़ नहीं रोकी गई, तो इसका परिणाम पूरे मानव समाज को भुगतना पड़ेगा। भारत लगातार 'अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग' की वकालत करता रहा है, लेकिन अपनी सीमाओं और डिजिटल संप्रभुता की रक्षा के लिए उसे इस नई अंतरिक्ष रेस में भी अपनी रणनीतिक बढ़त बनाए रखनी होगी।
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