सिलिकॉन वैली से लेकर बीजिंग तक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) अब केवल एक तकनीकी उपकरण नहीं, बल्कि वैश्विक भू-राजनीति का मुख्य मैदान बन चुका है। जेनेरेटिव और एजेंटिक AI के क्षेत्र में कौन सा देश आगे रहेगा, इसे लेकर अमेरिका और चीन के बीच एक भीषण और अदृश्य शीतयुद्ध छिड़ चुका है।
AI के माध्यम से सैन्य ड्रोनों का स्वचालन, साइबर जासूसी, और सोशल मीडिया के जरिए अन्य देशों की धारणाओं को प्रभावित करने की क्षमता ने वैश्विक नेताओं की चिंताएं बढ़ा दी हैं। एल्गोरिदम की इस रेस में आगे निकलने वाला देश पूरी दुनिया के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और डेटा पर अपना आधिपत्य स्थापित कर सकता है।
संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं एआई के नियमन (AI Governance) के लिए नियम बनाने में जुटी हैं, लेकिन महाशक्तियों का तकनीकी एकाधिकार इन प्रयासों को प्रभावित कर रहा है। डेटा गोपनीयता और एआई-संचालित हथियारों पर नियंत्रण पाना अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौती बन गया है।
भारत के पास दुनिया का सबसे बड़ा और विविध डेटाबेस है, जो एआई मॉडल के प्रशिक्षण के लिए अत्यंत मूल्यवान है। इसके अतिरिक्त, भारत की आईटी जनशक्ति दुनिया में सबसे बड़ी है। भारत के लिए एआई की यह भू-राजनीतिक दौड़ अपनी वैश्विक आईटी क्षमता को एक नया रणनीतिक आयाम देने का मौका है।
विदेशी AI मॉडल्स पर निर्भरता भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और डेटा संप्रभुता के लिए चिंता का विषय हो सकती है। इसलिए भारत 'इंडिया एआई' (IndiaAI) मिशन के तहत अपने स्वयं के विशाल भाषा मॉडल (LLMs) विकसित कर रहा है, ताकि भारतीय भाषाओं और सांस्कृतिक विविधता के अनुकूल सुरक्षित एआई ढांचा तैयार किया जा सके।
भारत ने वैश्विक मंचों पर हमेशा एआई के लोकतंत्रीकरण की बात की है। पश्चिमी और चीनी एकाधिकार के विपरीत, भारत 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों) के लिए एक समावेशी और जिम्मेदार एआई ढांचे का झंडाबरदार बनकर उभर रहा है। भारत का यह रुख उसे इस नई तकनीकी क्रांति का महत्वपूर्ण चेहरा बनाता है।
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