प्रशांत महासागर की शांत लहरों के बीच एक बार फिर युद्ध का काला साया मंडराने लगा है। ताइवान जलडमरूमध्य में बीते कुछ घंटों के भीतर जिस तरह का अभूतपूर्व सैन्य युद्धाभ्यास देखा गया है, उसने वैश्विक कूटनीति के माथे पर पसीना ला दिया है। दर्जनों लड़ाकू विमानों, विध्वंसक जहाजों और विमानवाहक पोतों ने ताइवान को चारों तरफ से घेरने की घेराबंदी शुरू कर दी है। दुनिया की दो सबसे बड़ी महाशक्तियां अब बिना किसी नकाब के आमने-सामने खड़ी नजर आ रही हैं।
सुपरपावर्स के बीच जारी यह शक्ति-प्रदर्शन केवल क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह 21वीं सदी की वैश्विक व्यवस्था को तय करने वाला मोड़ है। वाशिंगटन और बीजिंग के बीच जारी तल्ख जुबानी जंग अब सीधी सैन्य गतिविधियों में तब्दील हो चुकी है। ताइवान के हवाई रक्षा क्षेत्र में लगातार हो रही घुसपैठ और तटीय इलाकों में लाइव-फायर ड्रिल ने इस बात के स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि लाल ड्रैगन किसी भी हद तक जाने को तैयार है, जबकि दूसरी ओर से भी करारा जवाब देने की सैन्य तैयारियां पूरी कर ली गई हैं।
अगर इस क्षेत्र में गोलीबारी शुरू होती है, तो इसका असर वैश्विक टेक-उद्योग के लिए तबाही से कम नहीं होगा। ताइवान दुनिया के सबसे उन्नत सेमीकंडक्टर (चिप्स) का निर्माण करता है, जो स्मार्टफोन से लेकर लड़ाकू विमानों तक में इस्तेमाल होते हैं। ताइवान की नाकेबंदी का सीधा मतलब है वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटोमोबाइल उद्योग का पूरी तरह से ठप हो जाना। वैश्विक शेयर बाजारों में आई अचानक भारी गिरावट इस बात का सबूत है कि दुनिया इस संभावित संकट से कितनी डरी हुई है।
भारत के दृष्टिकोण से, ताइवान जलडमरूमध्य का यह तनाव एक अत्यंत संवेदनशील और चिंताजनक स्थिति पैदा करता है। भारत का 55 प्रतिशत से अधिक समुद्री व्यापार इंडो-पैसिफिक क्षेत्र और दक्षिण चीन सागर से होकर गुजरता है। इस समुद्री मार्ग में जरा सी भी रुकावट भारत के निर्यात और आयात चक्र को बुरी तरह प्रभावित कर सकती है। इसके अलावा, इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर की कमी से भारत का उभरता हुआ टेक और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर सीधे तौर पर प्रभावित हो सकता है।
सामरिक दृष्टि से, यदि चीन ताइवान पर अपना ध्यान केंद्रित करता है, तो उसका अगला असर भारत की वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर भी देखने को मिल सकता है। बीजिंग की आक्रामक नीतियां हमेशा से बहु-स्तरीय रही हैं। भारत को अपनी उत्तरी और पूर्वी सीमाओं पर चौकस रहना होगा, क्योंकि क्षेत्रीय अस्थिरता का लाभ उठाकर चीन लद्दाख या अरुणाचल प्रदेश से सटे इलाकों में नई उकसावे वाली गतिविधियां शुरू कर सकता है। Quad के एक सक्रिय सदस्य के रूप में भारत की भूमिका यहाँ बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
भारत इस समय अपनी 'मेक इन इंडिया' और 'सेमीकंडक्टर मिशन' को तेजी से आगे बढ़ा रहा है। ताइवान संकट के कारण कई वैश्विक कंपनियां चीन और ताइवान से बाहर अपने विनिर्माण ठिकाने तलाश रही हैं, जिससे भारत के लिए एक बड़ा अवसर भी उत्पन्न हो सकता है। हालांकि, इस आर्थिक अवसर का लाभ उठाने के लिए पहले क्षेत्रीय शांति का होना अनिवार्य है। भारत को इंडो-पैसिफिक में शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए अपने सहयोगियों के साथ मिलकर एक मजबूत रक्षात्मक रणनीति पर काम करना होगा।
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