उत्तरी ध्रुव की पिघलती बर्फ के बीच अब बर्फ नहीं, बल्कि महाशक्तियों की आक्रामकता पिघल रही है। आर्कटिक महासागर के रणनीतिक और खनिज समृद्ध क्षेत्रों में रूस और नाटो (NATO) सेनाओं की बढ़ी गतिविधियों ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नए 'शीत युद्ध' की शुरुआत कर दी है। वाशिंगटन पोस्ट और यूरोपीय रक्षा एजेंसियों की ताजा रिपोर्टों के अनुसार, रूस ने आर्कटिक क्षेत्र में अपनी परमाणु पनडुब्बियों और हाइपरसोनिक मिसाइल प्रणालियों की तैनाती को दोगुना कर दिया है, जिसके जवाब में नाटो ने भी अब तक का सबसे बड़ा आर्कटिक सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया है।
आर्कटिक क्षेत्र में छिड़ी यह जंग केवल जमीन या बर्फ पर कब्जे की नहीं है, बल्कि इसके नीचे छिपे अपार प्राकृतिक संसाधनों को हासिल करने की है। वैज्ञानिकों और भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तरी ध्रुव के नीचे दुनिया का सबसे बड़ा अप्रयुक्त तेल, प्राकृतिक गैस और दुर्लभ खनिजों का भंडार मौजूद है। जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फ पिघल रही है, वैसे-वैसे इन संसाधनों तक पहुंचने के रास्ते खुल रहे हैं। यही वजह है कि मास्को और वाशिंगटन दोनों ही इस क्षेत्र पर अपना वर्चस्व कायम करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।
रूस के राष्ट्रपति भवन क्रेमलिन ने स्पष्ट किया है कि आर्कटिक उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक रणनीति का मुख्य हिस्सा है और वह अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए हर आवश्यक कदम उठाएगा। दूसरी ओर, नाटो के महासचिव ने बयान दिया है कि आर्कटिक को किसी एक देश की जागीर नहीं बनने दिया जाएगा। नाटो सेनाएं अब बर्फ में माइनस 40 डिग्री तापमान पर युद्ध लड़ने का गहन अभ्यास कर रही हैं। यह अभूतपूर्व सैन्य जमावड़ा इस बात का प्रमाण है कि उत्तरी ध्रुव आने वाले दिनों में महाशक्तियों की सबसे बड़ी रणभूमि बनने वाला है।
इसके साथ ही 'नॉर्दर्न सी रूट' (Northern Sea Route) को लेकर भी खींचातानी तेज हो गई है। यह समुद्री मार्ग यूरोप और एशिया के बीच व्यापारिक दूरी को लगभग 40 प्रतिशत तक कम कर देता है। रूस इस पूरे जलमार्ग पर अपना नियंत्रण चाहता है, जबकि अमेरिका और यूरोपीय देश इसे अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र घोषित करने की मांग कर रहे हैं। इस व्यापारिक मार्ग पर कब्जे की होड़ ने समुद्री नौवहन सुरक्षा के सामने एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है, जिससे वैश्विक लॉजिस्टिक्स कंपनियां भारी अनिश्चितता में हैं।
भारतीय परिप्रेक्ष्य से देखा जाए तो आर्कटिक का यह तनाव नई दिल्ली के रणनीतिक और ऊर्जा हितों को गहराई से प्रभावित करता है। भारत, रूस के साथ मिलकर आर्कटिक में ऊर्जा खोज परियोजनाओं पर काम कर रहा है और नॉर्दर्न सी रूट के इस्तेमाल में भी उसकी गहरी रुचि है। हालांकि, नाटो और रूस के बीच बढ़ते इस सीधे तनाव के कारण भारत को बेहद संतुलित कूटनीतिक रास्ता चुनना होगा। भारत नहीं चाहेगा कि उसका पुराना मित्र रूस इस क्षेत्र में पूरी तरह चीन पर निर्भर हो जाए, इसलिए नई दिल्ली स्थिति पर बेहद बारीकी से नजर बनाए हुए है।
उत्तरी ध्रुव की जमा देने वाली ठंडक में शुरू हुई यह रणनीतिक गर्मी अब पूरे वैश्विक राजनीतिक तापमान को बढ़ा रही है। संसाधनों की यह अंधी दौड़ अगर समय रहते कूटनीतिक समझौतों के जरिए नहीं रोकी गई, तो आर्कटिक का यह नया मोर्चा पूरी दुनिया को एक ऐसे अनियंत्रित संघर्ष में धकेल देगा जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं होगा। महाशक्तियों की इस जंग ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि भविष्य के युद्ध अब केवल पारंपरिक सीमाओं तक सीमित नहीं रहेंगे।
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