यह सनातन सत्य रहा है कि किसी भी जीवंत गणराज्य की प्रामाणिकता केवल समयबद्ध मतदान के अनुष्ठान या सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण की औपचारिकता से सिद्ध नहीं होती। लोकतंत्र का वास्तविक स्पंदन मतपेटियों की धातु या इलेक्ट्रॉनिक मशीनों के चिप्स में नहीं, बल्कि मतदाता सूची की अक्षुण्ण शुचिता, नियामक संस्थाओं की संप्रभु स्वायत्तता और असहमति के नागरिक अधिकार की निर्भीक सांसों में धड़कता है। जब नई दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध विपक्षी स्वर मुखर होते हैं और 10 अक्टूबर को 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) सहित नागरिक समाज के युवा सड़कों पर उतरते हैं, तो यह महज एक तात्कालिक राजनीतिक घमासान नहीं है। यह उस संवैधानिक स्थापत्य की अंतरात्मा से टकराता हुआ प्रश्न है, जहां संस्थागत साख और जन-आस्था के बीच एक गहरी खाई आकार लेती दिख रही है।
मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) सैद्धांतिक रूप से कोई विसंगतिपूर्ण कवायद नहीं है। किसी भी गतिशील समाज में मृत, स्थानांतरित या दोहरी प्रविष्टियों के भार से चुनावी अभिलेखों को मुक्त करना निष्पक्षता का प्राथमिक तकाजा है। किंतु संकट तब उत्पन्न होता है जब यह तकनीकी सफाई पात्र नागरिकों के मताधिकार पर अप्रत्याशित कुल्हाड़ी बनकर गिरने लगे। 'द इंडियन एक्सप्रेस' के प्रामाणिक खुलासों ने इस संशय को और गहरा कर दिया है, जब यह तथ्य सामने आया कि निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में एसआईआर की कार्यप्रणाली, नाम विलोपन की संदेहास्पद गति और डेटाबेस के केंद्रीकृत नियंत्रण पर कम-से-कम 14 बार आधिकारिक आपत्तियों की स्याही छिड़की। आयोग भले ही इसे आंतरिक विमर्श और सर्वसम्मति का स्वाभाविक विस्तार कहकर सामान्य ठहराने का यत्न करे, किंतु संवैधानिक मंच के भीतर उठी असहमति की यह प्रतिध्वनि इस बात की साक्षी है कि परदे के पीछे सब कुछ सहज नहीं था।
आंकड़ों की निर्मम ज़मीन पर यह प्रक्रिया लगभग 13 करोड़ मतदाता प्रविष्टियों के विलोपन का एक भयावह और अभूतपूर्व क्षितिज रचती है। यद्यपि तंत्र इसे सामान्य प्रशासनिक छंटनी और पुनः पंजीकरण की सुविधा का आवरण पहनाता है, किंतु विपक्ष का यह संशय निराधार नहीं है कि क्या इस विशालकाय चक्रवात में हाशिए के वैध नागरिकों की लोकतांत्रिक पहचान तो नहीं विलीन हो गई? यह वह बिंदु है जहां राजनीतिक वाक्युद्ध निरर्थक हो जाता है और आंकड़ों की पारदर्शी पड़ताल अनिवार्य हो जाती है।
इस संस्थागत असमंजस के मूल में कार्यपालिका का बढ़ता प्रभाव है। 2023 का वह कानून, जिसने चुनाव आयुक्तों की चयन समिति से देश के प्रधान न्यायाधीश को बाहर कर प्रधानमंत्री, उनके द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री और विपक्ष के नेता की त्रिमूर्ति स्थापित की, उसने स्वायत्तता के सिद्धांत पर ही संदेह की छाया डाल दी। दो-बनाम-एक के इस असमान गणित ने भले ही किसी आयुक्त की व्यक्तिगत निष्ठा पर सीधा प्रश्नचिह्न न लगाया हो, किंतु संस्था की निष्पक्ष आभा को धूमिल अवश्य किया है। सरकार का यह भोथरा तर्क कि आयोग स्वतंत्र है और विपक्ष अपनी चुनावी पराजय के अवसाद में प्रलाप कर रहा है, इस संवैधानिक घाव पर मरहम नहीं बन सकता। जवाबदेही का तकाजा है कि कार्यपालिका प्रक्रियात्मक पारदर्शिता को सार्वजनिक पटल पर रखे।
इसके समानांतर, विपक्ष को भी अपने रणनीतिक संकोच से बाहर आना होगा। मुख्य चुनाव आयुक्त के त्यागपत्र की एकल मांग को संपूर्ण आंदोलन की धुरी बना देना बुनियादी विसंगतियों से आंखें मूंदना है। किसी व्यक्ति विशेष का निष्कासन मतदाता सूची की तकनीकी विकृतियों और एल्गोरिद्म की त्रुटियों का समाधान नहीं हो सकता। चुनावी पराजय के उपरांत धांधली का राजनीतिक विलाप करने और ठोस न्यायिक साक्ष्य प्रस्तुत करने के मध्य एक विशाल अंतर होता है। विपक्ष यदि वास्तव में लोकतंत्र का रक्षक बनना चाहता है, तो उसे हलफनामों, क्षेत्रवार विसंगतियों और विलोपित मतदाताओं के सजीव प्रमाणों के साथ न्यायपालिका के समक्ष उपस्थित होना होगा।
सड़क का प्रतिरोध जब 10 अक्टूबर को दिल्ली की सीमाओं में प्रवेश करता है, तो राज्य का प्रत्युत्तर भी पुराने दमनकारी सांचे में ढला दिखाई देता है। प्रतिबंधात्मक निषेधाज्ञाएं, संचार तंत्र का निलंबन और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की धरपकड़ - यह दृश्य किसी परिपक्व लोकतंत्र की गरिमा को शोभा नहीं देता। कानून-व्यवस्था की आड़ में अभिव्यक्ति के नैसर्गिक प्रवाह को अवरुद्ध करना नागरिक स्वतंत्रताओं के संकुचन का परिचायक है। सीजेपी और युवा संगठनों का यह आंदोलन तभी ऐतिहासिक प्रासंगिकता प्राप्त करेगा, जब वह चेहरों के विरोध से ऊपर उठकर संस्थागत शुचिता और चुनावी सुधारों का एक ठोस प्रारूप बनकर उभरे।
वर्तमान क्षितिज पर गहराता यह विवाद न तो कार्यपालिका की आत्ममुग्ध निर्दोषता का उद्घोष है और न ही विपक्ष की राजनीतिक हताशा से उपजा कोई क्षणिक प्रलाप; न ही मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की एकतरफा बलि से इस संस्थागत व्याधि का कोई समग्र उपचार संभव है। यह घटनाक्रम सत्ता के गलियारों की नूराकुश्ती से कहीं परे, भारत के अंतिम नागरिक के मताधिकार की गरिमा, संवैधानिक संस्थाओं की क्षीण होती साख और लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं की अस्मिता की एक निर्णायक अग्निपरीक्षा है।
कार्यपालिका के शीर्ष पर आसीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए यह आत्ममंथन की वह ऐतिहासिक वेदी है, जहां शासन की प्रामाणिकता केवल संख्याबल के दंभ से नहीं, बल्कि संस्थागत स्वायत्तता और प्रक्रियात्मक शुचिता पर उठे तीखे सवालों का पारदर्शी उत्तर देने की
नैतिक तत्परता से सिद्ध होगी। विपक्ष के सम्मुख भी यही कठोर कसौटी खड़ी है कि वह अपने संशय और रोष को केवल राजनीतिक अभियानों के खोखले नारों में जाया होने देगा, या फिर उन्हें अकाट्य न्यायिक साक्ष्यों के ठोस धरातल पर प्रतिष्ठित कर व्यवस्था को जवाबदेह बनाएगा। वहीं दूसरी ओर, निर्वाचन सदन के लिए यह अपने खोए हुए इकबाल को पुनर्जीवित करने का अंतिम अवसर है, जहां उसे साबित करना होगा कि उसके निर्णय किसी राजनीतिक छांव में नहीं, बल्कि विधि के निर्विकार आलोक और निष्पक्षता की कसौटी पर ढाले गए हैं।
लोकतंत्र की देहरी पर चुनावी विजय निश्चय ही जनआकांक्षाओं का पावन जनादेश है, किंतु वह निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही के संवैधानिक दायित्वों से मुक्ति का परवाना कतई नहीं हो सकती। ठीक इसी प्रकार, चुनावी समर की पराजय स्वतः किसी धांधली का अकाट्य दस्तावेज नहीं बन जाती। भारतीय लोकतंत्र के विशाल स्थापत्य को सुदृढ़ करने का मार्ग किसी एक पक्ष को पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर दोषी अथवा निर्दोष ठहराने की संकीर्ण परिधि में नहीं सिमटा है। इसका वास्तविक समाधान उस सुदृढ़ और अभेद्य व्यवस्था के निर्माण में निहित है, जहां कतार में खड़े हर पात्र नागरिक का मताधिकार अक्षुण्ण रहे, हर संशय की निष्पक्ष और तटस्थ जांच हो, और प्रत्येक संवैधानिक संस्था अपनी जवाबदेही की वेदी पर शीश नवाने को तत्पर रहे। वर्तमान असंतोष और प्रतिरोध के इन स्वरों की सार्थकता किसी तात्कालिक राजनीतिक उलटफेर में नहीं, बल्कि इसी संस्थागत शुचिता की पुनर्स्थापना में निहित है—और यही हमारे गणराज्य की अंतिम लोकतांत्रिक कसौटी है।
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लेखक- Cult Current के संपादक है, समसामयिक मुद्दों पर पैनी दृष्टि रखते है,